जागते रहो

यह ब्लाग " जागते रहो " भ्रष्टाचार,अपराध,कानून व्यवस्था और लोकतंत्र के बिगड़े हुए रुप को उजागर करने के लिए एक प्रयास मात्र है। लोग किस तरह इसमें फंसे हुए हैं और एक खास तबका कैसे इसका फायदा उठा रहा हैं। सरकार,राज्य,नागरिक और सत्ता का क्या खेल है और कुछ लोग कैसे खेल रहे हैं। यह ब्लाग इस पर रोशनी डालेगा। यह एक कोशिश है लोगों को जगाने की और उनमें जागरुकता पैदा करने की। इसीलिए इसका नाम "जागते रहो" रखा गया है।

Thursday, December 3, 2020

गाजियाबाद में हिन्दू देवाताओं के अपमान पर कारवाई कब तक?

 

अजय शर्मा 

वरिष्ठ पत्रकार 


अभी कुछ दिन पहले गाजियाबाद के एक लोकल यू टयूब चैनल का वीडियो मुझे देखने के लिए मिला। जिसमें किसी सार्वजनिक शौचालय की बाहरी दीवारों पर भगवान महादेव की तस्वीर की वाॅल पेटिंग की गई है। जिसको लेकर कुछ हिन्दुवादी संगठनों ने अपना विरोध प्रदर्शन भी किया। 

लेकिन इसने मुझे फिर से सोचने पर मजबूर कर दिया कि भारत में क्यों हिन्दू देवी देवताओं का अपमान किया जा रहा है। क्यों सनातन धर्म संस्कृति पर चोट पहुंचाई जा रही है। क्या यह पूर्व सुनियोजित है। क्या इस साजिश में बाॅलीवुड का एक गैंग भी सक्रिय है जो बहुत ही मक्कारी भरी धर्म निरपेक्षता का दिखावा करने वाले कलाकारों से भरा हुआ है। इसी वजह से आए दिन हिंदू देवीताओं पर अभद्र टिप्पणियां की जाती हैं। अभी नवरात्रों के दौरान भी सलमान खान और रणवीर सिंह ने अभद्र टिप्पणी की थी। स्वरा भास्कर भी किसी से कम नहीं है। बाॅलीवुड का सनातन धर्म विरोधी गैंग पूरी तरह से सक्रिय है। अभी हाल ही में नेटफिल्क्स पर रीलीज हुई वेब सीरीज ए सूयटेबल बाॅय में हिन्दू धर्म का अपमान किया गया। ऐसे ढेरों उदाहरण हैं जिसमें हिन्दू धर्म को सबसे ज्यादा गलत दिखाया जाता है। ऐसी फिल्मों की भरमार है। 

आपको याद होगा कि पिछले साल जनवरी 2019 में प्रयागराज कुंभ में कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी का दुर्गा के अवतार वाला विवादित पोस्टर लगाया गया था। इस पोस्टर में लिखा गया था- कांग्रेस की दुर्गा प्रियंका करेंगी शत्रुओं का वध। इससे पहले पटना में कांग्रेस नेताओं ने पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी को राम का अवतार दिखाते हुए पोस्टर लगाए थे। अमेठी में भी राहुल गांधी को राम दिखाते हुए पोस्टर लगाए जा चुके हैं। जाने अंनजाने में इसके जरिए  हिंदू देवी-देवताओं का मजाक बनाया गया। 

कांग्रेस के बड़े नेता और राहुल गांधी के करीबी शशि थरूर ने भी प्रयागराज कुंभ को लेकर हिंदू धर्म का मजाक उड़ाया था। दिल्ली में संगठन सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया द्वारा आयोजित ‘एक शाम बाबरी मस्जिद के नाम’ कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कांग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर ने भगवान राम, अयोध्या स्थित राम जन्मभूमि स्थल सभी को कठघरे में खड़ा कर दिया था। जिसके बाद उन्हें कड़ी आलोचना का शिकार होना पड़ा था। 

सेक्युलर देश में हिन्दुओं की आस्थाओं को निशाना बनाने के लिए इतना उतावलापन क्यों है? इस धर्म निरपेक्ष देश में हर दूसरे मुद्दे पर अक्सर हिन्दू आस्थाओं का अपमान करना क्यों इतना आसान है? कभी हिन्दुओं के त्योहारों का मजाक बनाया जाता है तो कभी त्रिशूल जैसे प्रतीकों का उपहास बनाया जाता है। समाज को तोड़ने के लिए इस तरह के प्रपंच गढ़ने वाले लोग कौन हैं और उन्हें किसने शरण प्रदान की है? यह जांच का विषय है। 

इस तस्वीर में किसी कुत्सित मस्तिष्क के रचनाकार ने भारत देश के संविधान का दुरूपयोग करते हुए हिन्दू देवीताओं का अपमान किया है। निश्चित रूप से यह वाॅल पेंटिग घृणित, उन्मादी मानसिकता की उपज से ज्यादा और कुछ भी नहीं है। क्या धार्मिक प्रतीकों द्वारा अपनी कुंठा की अभिव्यक्ति करने वाले जानते हैं कि भविष्य में समाज को धर्म से ही नैतिकता सीखनी होगी?


मनुस्मृति जलाकर और हिन्दू आस्थाओं को ठेस पहुँचाकर अल्पकालिक रोष व्यक्त करने वाले अक्सर भूल जाते हैं कि वह कोई बड़ा परिवर्तन नहीं ला रहे हैं बल्कि इस अंतराल को और बढ़ा रहे हैं। 

मेरे विचार से यदि किसी भी संगठन अथवा संस्था का दर्शन जानना है, तब उस संस्था और संगठन के अंतर्गत जो क्रांतियाँ आई हैं, उनका आवश्यक रूप से अध्ययन किया जाए। क्रांति दर्शन की जननी है, चाहे उसे दर्शन की जननी न भी माना जाए, फिर भी वह ऐसा दीप है, जो दर्शन को प्रकाशयुक्त बनाता है। धर्म भी इस नियम का अपवाद नहीं हो सकता। इसलिए मेरी दृष्टि से सबसे अच्छा तरीका यही है कि यदि हम किसी धर्म के दर्शन का मूल्यांकन करना चाहते हैं और इसके लिए कोई कसौटी निश्चित करना चाहते हैं, तब उस धर्म में जो क्रांतियाँ आई हैं, उनका अध्ययन करें। यही एक तरीका है। ना कि उसका तिरस्कार करके। 

अपने देश में धर्म निरपेक्षता और विचारों की अभिव्यक्ति के अधिकार को कुत्सित हथियार बनाकर कुछ संगठन सनातन धर्म संस्कृति या फिर मनुवादी संस्कृति के खिलाफ जहरीला विरोध करते दिखाई दे जाते हैं। 


अब गाजियाबाद में शौचालय की दीवार पर भगवान महादेव की तस्वीर की वाॅल पेंटिग यह बताने के लिए काफी हिन्दू देवी देवताओं का अपमान सुनियोजित ढंग से किया जा रहा है। इसकी बहुत गहन जांच पड़ताल की आवश्यकता है। गाजियाबाद के सांसद जनरल वीके सिंह, विधायक अतुल गर्ग और मेयर आशा शर्मा जी इसकी गंभीरता को समझते हुए जांच करवाएं। जिससे गाजियाबाद के लोगों के बीच एक सार्थक संदेश जाए। गाजियाबाद पूछ रहा है हिन्दू देवीताओं के अपमान पर अभी तक कारवाई क्यों नहीं हुई।   

Posted by ajay sharma at 12/03/2020 04:23:00 PM No comments:

Thursday, November 26, 2020

कोरोना ना हुआ शहनशाह हो गया

 

कोरोना ना हुआ शहनशाह हो गया
अजय शर्मा वरिष्ठ पत्रकार

अंधेरी रातों में सुनसान राहों पर हर जुल्म मिटाने एक मसीहा निकलता है जिसे लोग शशाह कहते हैं। यह फिल्म 1988 में आई फिल्म शहनशाह की है। जो बरबस कोरोना को लेकर लगाए गए रात के कर्फु को लेकर इस तरह गुनगुना रहे हैं। अंधेरी रातों में सुनसान राहों पर हर आदमी को मिटाने एक यमराज निकलता है जिसे लोग कोरोना कहते हैं।
कोरोना ना हुआ शशाह हो गया। जो सिर्फ रात को ही निकलता है। जिसके प्रकोप से बचने के लिए रात का कर्फु कुछ शहरों में लगाया गया है।

ऐसे कुछ चुटकुले या फिर हंसी के व्यग्य सोशल मीडिया पर तैर रहे हैं। लेकिन इस कोरेना ने एक बार फिर से नई बहस को जन्म दे दिया है। बहस हो रही है कि लोग लापरवाह हैं या फिर सरकारें। या फिर खुद ही। जिम्मेदारी किसकी है इस आपदा से सामना में। ऐसे में कुछ ज्वलंत सवाल मुंह बयां खड़े हैं।

देश भर में विशेष रूप से दिल्ली, महाराष्ट्र और गुजरात में को विभाजित के मामलों में वृद्धि हो रही है, दिल्ली में विशेष रूप से नवंबर में हालात खराब हो गए हैं। दिल्ली में एक दिन में 6,746 मामले दर्ज किए गए, उसके बाद महाराष्ट्र में 5,753 नए मामले दर्ज किए गए, जबकि केरल में 5,254 दैनिक मामले दर्ज किए गए। वहीं डब्लूएचओओ ने उत्तर प्रदेश सरकार की कोरोना से सामना को लेकर प्रशंसा की है।

डॉक्टरों को डर था कि दिल्ली अच्छी तरह से भारत के शीतकालीन संक्रमण की पहली लहर का केंद्र बन सकती है और वही हुआ है।
नवंबर की शुरुआत से अब तक राजधानी में 128,000 से अधिक मामले जुड़े हुए हैं। 12 नवंबर को इसने 8,593 मामले दर्ज किए, एक दिन में सबसे अधिक प्रकोप शुरू हुआ। दिल्ली अब किसी भी राज्य की तुलना में अधिक मामलों को दर्ज कर रही है। इसकी कुल केस संख्या 500,000 से अधिक है। पिछले कुछ दिनों से स्थिति और भी गंभीर होती जा रही है
अभी कुछ दिन पहले दिवाली के बाद मौसम तेजी से बदला और स्माग ने पूरे देश को ढक लिया तो केंद्र सरकार ने हरियाणा, राजस्थान, राजस्थान, और मणिपुर के जिलों में उच्च स्तरीय टीमों को दौड़ाया, जो साइवी -19 मामलों की उच्च संख्या की रिपोर्ट कर रहे थे। इन टीमों को सकारात्मक मामलों की रोकथाम, निगरानी, ​​परीक्षण और अनुकूल नैदानिक ​​प्रबंधन को मजबूत करने की दिशा में प्रयासों का समर्थन करने के लिए भेजा गया था।

मध्य प्रदेश सरकार ने इंदौर, भोपाल, ग्वालियर, रतलाम और विदिशा जैसे पांच शहरों में कर्फ्यू 10 बजे से सुबह 6 बजे तक लगाया। गुजरात सरकार ने सूरत, वडोदरा और राजकोट शहरों में रात का कर्फ्यू लगाने का फैसला किया। राजस्थान, उत्तर प्रदेश, पं। बंगाल सहित पूरे देश में कोरोना का संक्रमण चरम पर है। यदि आप देश के नक्शे को देखते हैं तो वह पूरा नक्शा को विभाजित की मौजूदगी से भरा हुआ है।

कोरोना के संक्रमण और रोगियों में बेतहाशा वृद्धि की कारण कोशिकाओं, और कोशिकाओं के खुलने से वृद्धि हुई है, और एक व्यस्त त्यौहार के मौसम में सामाजिक मेलजोल में वृद्धि हुई है। गिरते तापमान और बढ़ते वायु प्रदूषण से भी इसका प्रकोप हुआ है। रोगी इस समय समूहों में आ रहे हैं। त्योहारों और लगातार और बार-बार इनडोर चेकोन्स में भाग लेने के बाद परिवारों और दोस्तों को चेतन और वायरस से पीड़ित हो रहे हैं।

आपको जानकर हैरानी होगी कि डॉ। इस समय युवा रोगियों की संख्या में वृद्धि की रिपोर्ट कर रहे हैं। डॉक्टरों का कहना है कि गर्मियों की तुलना में अधिक कम घातक परिणाम हो लेकिन चिंता है कि कई रोगियों की, जो बीमारी से उबर चुके हैं, जल्द ही कोविड की चपेट में आ जाएंगे। श्वास, मस्तिष्क, हृदय और हृदय प्रणाली से सब कुछ प्रभावित होगा। नमकीन, आंत, यकृत और त्वचा। इस तरह की स्थिति से निपटने के लिए बहुत सावधानी की जरूरत है। गंभीर रूप से बीमार रोगियों में से कुछ 70 प्रतिशत 55 वर्ष से ऊपर हैं, लेकिन बहुत सारे रोगी 25 से 45 वर्ष के बीच हैं।

 दोस्तों युवा महसूस करते हैं कि वे अजेय हैं और वे बाहर जा रहे हैं और मिल रहे हैं। मेरा मानना ​​है कि इन युवा वयस्कों में से कई कट्टरपंथी सुपर-स्प्रेडर हैं।

ऐसी बहस फिर वही कि कोरोना को फैलाने देने के लिए जिम्मेदार कौन है। इसके लिए साझा प्रयास होना चाहिए। इसे सत्ता पक्ष और विपक्ष की राजनीति का मुददा नहीं बनना चाहिए। कोरोना से बचाव के लिए सार्थक प्रयास होने चाहिए। इसमें सभी देशवासियों की सहभागिता अनिवार्य है। इससे सामना करने के लिए रात का कर्फु पर्याप्त नहीं है। अन्यथा लोग ऐसे ही गुनगुनाएंगे गाते हैं कि कोरोना ना हुआ शशाह हो गया है। इसलिए तत्काल प्रभाव से कठोर कदम उठाने की आवश्यकता है। साथ ही डब्लूएचओओ ने जो प्रशंसा उत्तर प्रदेश सरकार की है उसे यथा बनाए रखना है। हमें दिल्ली और हरियाणा से लगे शहरों को लेकर ठोस रणनीति की आवश्यकता है।  

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Posted by ajay sharma at 11/26/2020 04:14:00 PM No comments:

तेंदुआ कहीं पालतू तो नहीं था?


वरिष्ठ पत्रकार अजय शर्मा की कलम से 

गाजियाबाद में एक तेदुंए के देखने जाने की खबर ने मीडिया में सुर्खियां बटोरी। इस खुनूखर जानवर ने जीडीए वीसी कंचन वर्मा के गार्ड को भी 

घायल हो गया। और उसके बाद शहर भ्रमण पर निकल गया। उसके शहर के भ्रमण को रोकने के लिए वन विभाग की टीम शहर के चप्पे चप्पे पर तैनात हो गई है। लेकिन वह सिर्फ शहर में तैनात सीसीटी कैमरों को जिसकी फुटेज सोशल मीडिया पर अपलोड कर दी गई। 

लेकिन यह तेदुंआ यानि कि लेपर्ड कुछ सवाल खडे कर रहा है। जिनके उत्तर गाजियाबाद की मांग है। यह गाजियाबाद शहर के राजनगर कालोनी कैसे पहुंचा। क्योंकि गाजियाबाद से लगे हुए ऐसे जंगल कौन से हैं जहां पर जंगली जानवर रहते हैं। पिछले एक साल में इन जंगलों में या फिर सीमावर्ती इलाकों में तेदूए जैसे जानवर देखे गए हैं। 

इस जानवर के निशान सिर्फ राजनगर में ही क्यों है। सबसे बड़ी बात यह तेदूआ हिंट दिखाई नहीं पड़ रही है। उसने गार्ड पर हमला तो किया लेकिन अपने प्राकृतिक स्वाभाव के विपरीत जख्मी करके छोड़ दिया। ऐसा क्यों। कहीं यह तेदुंआ किसी का पालतू तो नहीं था। इसकी जांच पड़ताल की आवश्यकता है। क्योंकि साहब शौक बड़ी चीज है। लोग कुत्ते बिल्ली के अलावा जंगली जानवर पालने की भी इच्छा रखते हैं। लेकिन यह इच्छा इंसानी जीवन के लिए खतरा होता है इसलिए ऐसे जानवरों के साथ फोटो खिंचवाकर सोशल मल्टीमीडिया पर अपलोड कर दिए जाते हैं। इसलिए साहब ने कहा कि शौक बड़ी बात है। 

ऐसे में शुद्धता के साथ तेदूए की मौजूदगी की जांच पड़ताल की आवश्यकता है। आज तक हिन्दू शहर के भ्रमण के लिए निकला है। हो सकता है कल को शेर, लोमड़ी, हाथी, टाइगर, अजगर या फिर कोबरा भी शहर भ्रमण के लिए आते हैं। अत यह जांच का विषय है, तेदूओं के रूप में जंगली जानवर शहर भ्रमण के लिए कैसे आया। 

 ऐसा नंदू के गाजियाबाद के शहरी क्षेत्र मेें आने वाला यह पहली घटना हो। अगस्त के महीने में भी साहिबाबाद के वैशाली में तेदुआ देखे जाने की खबर आई थी तब तक भी रेस्क्यू टीम और वन विभाग की टीम को कोई सुराग नहीं मिला था। दो महीने बाद फिर तेदुआ राजनगर कालोनी में घूमता हुआ दिखाई दिया। इस बार भी वन विभाग खाली हाथ है। इस नाकामी ने लोगों की जिदंगी को खतरे में डाल दिया है।

डीएफओ दीक्षा भंडारी के मीडिया को बताए गए आश्वासन में सिर्फ हताशा ही समझ में आती है। क्योंकि वे पिछली बार की ही तरह इस बार भी लेपर्ड के निशान नहीं मिले हैं। लेकिन उन्हें नए सिरे से सोचना होगा और जांच शुरू होनी चाहिए। लोगों की संभावनाओं के आधार पर कि वह देहरादून से किसी टक में यहां पहुंच जाएगी या फिर हरनंदी नदी के किनारे यहां तक ​​आ गई। " काम नहीं चलेगा। यह लोगों की जिदंगी का सवाल है।  


तंेदुआ का आसान शिकार बच्चे होते हैं। तंेदुआ कुत्तों का भी शिकार करना पसंद करता है। लेकिन अभी तक ऐसी कोई भी घटना सामने नहीं आई है। लेकिन दहशत के बादल गाजियाबाद, दिल्ली, नोएडा, मेरठ में छाए हुए हैं। 

दो हफते पहले ही बरेली में तेंदुआ देखने के लिए मिला था जिसके बाद कुछ बच्चे बीमार पड़ गए थे। आपको याद होगा कि सन 2019 -20 में जयपुर, जबलपुर, पीलीभीत, ग्वालियर, नागपुर, हैदराबाद में भी तेदुए की खबरें थीं लेकिन ये वो क्षेत्र थे जो जंगल के करीब थे।


इसलिए अपनी जिदंगी की सुरक्षा के लिए हम सभी को खोजने के लिए रहना होगा। पुलिस और रेस्क्यू टीम के फोन नं अपने पास इमरजेंसी मोड में रखने होंगे।

प्रशासन को भी चैकन्ना और उपस्थिति मोड में रहने की आवश्यकता है। कहीं ऐसा ना हो यह तेदुआ कुद लोगों को अपना शिकार बनाने ले। पिछली बार की तरह नहीं होना चाहिए कि वह तेदुआ जो बिग फैट कैट समझ में आ रहा था और नजरअंदाज कर दिया गया था। महज उसके दो महीने बाद ही गाजियाबाद के शहरी क्षेत्र में तेदुआ घूमता हुआ दिखाई दिया। जिन्होंने जीडीए के सफाईकर्मी पर भी हमला कर दिया। इसलिए लोगों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए इस लेपर्ड का पकड़ा जाना बहुत जरूरी है। अगर यह लेपर्ड आदमखोर हो गया तो बहुत सी जिदंगियों की बलि चढ़ जाएगी। मुस्तैदी के साथ उसे ढूंढा जाना अनिवार्य है और साथ ही यह लेपर्ड यहां कैसे और कहां से पहुंचा। इन सवालों के जवाब गाजियाबाद पूछने वाला है। 

Posted by ajay sharma at 11/26/2020 04:10:00 PM No comments:

Wednesday, November 25, 2020

मत भूलो यह कोरोना महामारी है

 अजय शर्मा वरिष्ठ पत्रकार  


गाजियाबाद पुलिस ने कोरोनान्वेशन को लेकर एक संदेश जारी किया कि अगर आपने घर से बाहर निकलते वक्त फ़ंक्शन नहीं लगाया तो आपको और 10 घंटे की असथाई जेल की सजा हो सकती है। साथ ही शादी के मौसम में सामाजिक भागीदारी के लिए लोगों की संख्या 50 कर दी गई है। आज देवठान है और मेरी सुयासटी में सुबह से बैंड बाजे वाले किसी घर में विवाह आयोजन के लिए बैंड बजा रहे हैं।


कोरोना महामारी के समय में विवाह के मौसम में शासन प्रशासन की व्यवस्था की अग्निपरीक्षा है। क्योंकि जरा सी भी लापरवाही कोरोना को दावत देना जैसी है। कोरोना की कालिख गहरी होती रही है। ये सिर्फ महामारी भर नहीं रह गई है। इसने समाज, सरकार, सरोकार और इंसानी संवेदनाओं पर अपना घातक पंजा जमा दिया है। यह समय मानवता के एक होने का था पर हो सकता है।


हमने पिछले कुछ महीनों में देखा है कि तमाम फर्जी ऑड-वीडियो और सोशल मीडिया के अदृश्य कीमियागीरों की हरकतों का कमाल रहा है कि देश की बड़ी आबादी के जेहन में कोरोना को लेकर भ्रांतियां भर गई हैं। ऐसे लोगों कों यह भी नहीं बिसराना चाहिए कि आज नहीं, तो कल महामारी अपने हिस्से की बलि लेकर चली जाएगी पर यह बेवकूफी और लापरवाही का विष समाज को तोड़-मरोड़कर रख देगा। मुझे इन दिनों अक्सर अल्वेयर कामू का प्लेग याद आता है। उपन्यास में ओरॉन नाम के शहर में प्लेग की वजह से नाकाबंदी हो गई थी और उसके बाद चर्च का पादरी जो कह रहा था, उसके साथ जो स्थिति बनी उसने वहां की तस्वीर इतनी भवावह बनाई उसे बयां करना मुश्किल है।

कोरोना की वजह से हमने पिछले कुछ महीनों में स्थितियों के प्रति पनप रहे अविश्वास को भी देखा है। भारत के अलग-अलग राज्यों की सरकारों के रूख ने जो तस्वीर दिखाई वो लोगों में गुस्सा और नाराजगी भरी। अमेरिका और यूरोप के तमाम देशों में सरकारों पर भी सवालिया निशान खड़े हुए। इटली, स्पेन और ब्रिटेन में रोगियों और मौतों की संख्या हर रोज अपना ही रिकॉर्ड तोड़ रही थी। ऐसे में कोरोनातीत ब्रिटिश प्रधानमंत्री की हर ओर थू-थू तो हो रही थी के साथ ही सरकार की कार्यशैली पर भी सवाल उठ रहे थे। अमेरिका से लेकर रूस तक सभी के हालात खराब थे। और हम अपने देश भारत में कोरोना को लेकर लापरवाही बरत रहे थे और आज भी वही स्थिति है। यकीनन पूरी दुनिया में सरकारों की विश्वसनीयता खतरे में पड़ गई है। अगर यह दौर लम्बा खिंचा तो यह धरती अराजकता की ओर बढ़ती दिखाई पड़ती है। भारत में लॉकडाउन को दोष से लागू करवाया गया और अब फिर से लाकडाउन की चर्चा हो रही है। 


संकट अगर पूरीची धरती का है, तो इसके वाशिंदों को एक तो होना पड़ेगा। कोविद -19 ने अपने पांव सरहनों को बिना पहचाने पसारे हैं। इससे लड़ाई भी ऐसे ही लड़नी होगी पर यह नामुमकिन है। अमेरिका का उदाहरण लैन। अब तक यह महादेश ऐसी आपदाओं के वक्त में एक क्लस्टर महाजन की तरह इमदाद मुहैया करा देता था। मैंने उसके लिए इस विशेषण का इसलिए उपयोग किया, क्योंकि किसी खुर्रान्त सूदखोर की भांति अमेरिका ने हमेशा अपनी इमदाद की बड़ी कीमत वसूल की है। इस समय पृथ्वी का स्वर्ग स्वयं नर्क में तब्दील हो गया है। 


अमेरिका और यूरोप के बाद शंकाएं, आशंकाएं और अधीरताएं पूरीची दुनिया में फैली हैं। सवाल उठता है कि जब धनी-मानी देश इसके सामने-विवश नजर आ रहे हैं, तो गरीब मुल्कों का क्या होगा? अमेरिका के डॉ और नर्स साधनहीनता की दुहाई दे रहे थे। रही बात भारत की तो हमारे तमाम अस्पताल तो प्राथमिक सुविधाओं तक से लैस नहीं हैं। बातें हम भले ही बहुत बड़े करते हों, पर सच यह है कि पहाड़ी, समुद्री और रिवानी क्षेत्रों के बहुत से गांवों में आज भी अगर कोई युवती गर्भवती होती है, तो उसे सलाह दी जाती है कि अपने मायके हो आओ, कहीं पीड़ित के दौरान। कुछ न हो जाए? आपको यह बताता है कि मेरे दिमाग में एक तस्वीर कौंध रही है। अप्रैल के महीने में मैंने मीडिया में कश्मीर के दुर्गम इलाके की फोटो देखी थी। कई लोग एक जुगाड़ की स्ट्रेचर पर गर्भवती महिला को टांगे ले जा रहे थे। चिकित्सा और स्वास्थ्य के मामले में हम आदिम युग में जी रहे हैं।


क्या आप भूल गए हैं कि कुछ महीने पहले तमाम राज्यों से ऐसी रिपोर्ट आईं जिसमें बताया गया था कि कोरोना मरीज का इलाज करने वाले चिकित्सा कर्मियों के पास जरूरी ड्रेस ही उपलब्ध नहीं हैं। यह तो दूर-की की बात थी, देश की राजधानी दिल्ली के बेहतरीन गंगाराम अस्पताल के दर्जनों चिकित्सा कर्मियों को क्वारंटीन कर दिया गया था। यदि कोई परिस्थिति बिगड़े, तो चिकित्सा कर्मियों के लिए खतरा और बढ़ेगा। 


यह हमारी स्थायी हतभागिता है की ऐन जंग के समय हमें मालूम पड़ता है कि हमारे युवा शेयर डिस्काउंट-ओ-सामानों को नहीं चला रहे हैं। अमेरिका और यूरोप में निजी अस्पताल इस महामारी से लड़ने में अपनी सरकारों की मदद कर रहे हैं। इसलिए मौजूदा समय में भारत में बड़े अस्पताल श्रृंखलाओं को इस मामले में खुल कर सामने आना चाहिए। गिने-चुने निजी अस्पताल हैं, जो इसका इलाज कर रहे हैं। सरकारी और निजी स्वास्थ्य सेवाओं के बीच तालमेल अगर नहीं बढ़ा, तो आने वाले दिनों में कठिनाई हो सकती है।


देश को चाहिए कि वह ऐसे मुद्दों पर विचार कर इनका हल जल्दी से खोजे कि आखिर हम कर क्या रहे हैं? इसकी उलट सारी बहस लव जिहाद कानून, एमएलसी चुनाव, जम्मू कश्मीर के जिला विकास परिषद चुनाव और बंगाल चुनाव पर केंद्रित हो गई है। हम पर और मुद्दों पर भी ध्यान देना होगा। अब तक जितने मरीज सामने आए हैं, वो शेरपाही का ही नतीजा है। इस ढिलाई का एक ही प्रायोजन है कि चिकित्सा सुविधाओं को जल्दी इस लायक बना लिया जाए कि वे संकट की स्थिति में आम आदमी की जीवन रक्षा कर सकें।


आज दिल्ली के साथ साथ पूरे देश में एक सिरहन लोगों के दिलों में बैठ गया है कि अगर उनके घर में कोई बीमार है, तो उसका क्या होगा? कहीं परिवार का एक और सदस्य तो उसकी चपेट में नहीं आ जाएगा? क्या पता कब इट्स हमें भी चपेट में ले ले?

ऐसे में प्रभावी व्यवस्था बनाना चुनौती का काम है। ऐसा नहीं हैं कि सरकारें सो रही हैं। केंद्र सरकार ने उस समय में लॉकडाउन कर दिया था, जब अधिकांश देश इसके बारे में सोच ही रहे थे। जिन्होंने देरी की, वे इसका दुष्परिणाम भुगत रहे हैं। जर्मनी ने कोरोना पीड़ितों के मामले में चीन को पीछे छोड़ दिया था। भारत में ऐसे भी मुख्यमंत्री हैं जिन्होंने कोरोना से आम जनमानस को बचाने के लिए दिन रात एक कर दिया है। 


हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि आपदा से लड़ने का सबसे बढ़िया तरीका आपसी सहयोग और निर्भरता है। हिन्दुस्तानियों को यह कायम रखना होगा यह कैसे होगा? हम तो गैरजरूरी मुद्दोंदो में सिर खपाए बैठे हैं।


Posted by ajay sharma at 11/25/2020 12:54:00 PM No comments:

Monday, November 23, 2020

कोरोना अभी जिंदा है

अजय शर्मा की कलम से 


आज एक बार फिर से मुझे कहना पड़ रहा है कि कोरोना अभी जिंदा है। दिल्ली से आने वाले मौत और संक्रमित लोगों के आंकडें़ बताने के लिए काफी हैं कि हालात भयानक होने वाले हैं। यूरोपियन देशों के हालात तो पहले से ही बदतर हैं। 

काॅलर टियून में अमिताभ बच्चन की चेतावानी देती आवाज लोगों को कितना जागरूक कर पा रही है। यह बहस का विषय हो सकती है लेकिन राज्य सरकारों ने लोगों को कोरोना के दलदल में फंसाने वाला काम ही किया है। जानकारों ने पहले से ही चेताया था, डाॅक्टर्स ने भी बताया था कि सर्दियों में कोरोना जमकर कहर बरपायेगा। जैसे ही पारा नीचे जाएगा। संक्रमण का खतरा और बढ़ जाएगा। सर्दी, खांसी, नजला, बुखार लोगों को होंगे। मौसम जब बदलाव करता है तो इस तरह की बीमारियों की संभावनाएं तेज होती हैं। ये बीमारियां कोरोना को न्यौता देती हैं, दावत देती हैं। और अब वही हो रहा है। कोरोना का संक्रमण फिर से मुंह आने लगा है। कोरोना का आंकड़ा बढ़ रहा है। लेकिन हमने कुछ नहीं किया। हमने यानि हम और सभी राज्य सरकारें। हम आंखें बद करके बैठे हुए थे। हम शुतुरमुर्ग की तरह अपनी गर्दन जमीन में गाड़ ली कि सब अच्छा है। कुछ नहीं होगा। सब वहम है। बाजार खुले हुए थे। त्यौहारों को मौसम था। जबरदस्त भीड़ देखने को मिली। देश की राजधानी दिल्ली से लेकर नोएडा, गाजियाबाद, आगरा, मुरादाबाद, बरेली, लखनउ, चंडीगढ़, देहरादून, जयपुर, कोलकाता, मुंबई, पटना, अहमदाबाद, बंगलुरू तक कोई शहर नहीं बचा। लोग सड़कों पर और बाजारों में। देह दूरी की धज्जियां उड़ाई जा रही थी। कोई भी मास्क लगाने के लिए तैयार नहीं। लोग खतरों के खिलाड़ी बने हुए। लापरवाह, गैर जिम्मेदार लोग। हमने यह सब होने दिया। 

मैं आपको याद दिला दूं कि हमने घरबंदी भी स्वीकार की यानि कि लाॅकडाउन। हमने थाली ताली भी बजाई। हमने कोरोना वाॅरियर को सम्मानित भी किया। और अब कोरोना के संक्रमण का आंकड़ा 91 लाख को छू रहा है तो लोग कह रहें हैं कि यह तो होना ही था। इसके लिए सरकारें जिम्मेदार हैं।

लेकिन इस वक्त सबसे ज्यादा चर्चा देश के दिल दिल्ली की हो रही है। दिल्ली में केस बढ़ रहे हैं। दिल्ली सरकार और गृह मंत्रालय के बीच बैठक भी हो चुकी है। अलग अलग राज्यों में टीमें भी भेजी जा चुकी हैं। और अब तो दिल्ली बार्डर पर कोरोना की टेस्टिंग भी शुरू हो चुकी है। शादी विवाह जैसे सामाजिक आयोजन में लोगों की संख्या 200 से घटकर 50 तक हो गई है। यहां तक कि राजस्थान में रात का कफर््यू तक लगाया जा चुका है। दिल्ली में मास्क ना लगाने पर जुर्माना 2000 रूपए तक हो चुका है। 

आपके लिए मेरी यह चेतावनी है कि कोरोना शहर के साथ साथ गांव में भी फैल रहा है। हिमाचल का एक पूरा गांव शादी के आयोजन के बाद कोरोना से संक्रमित हो गया सिर्फ एक व्यक्ति बचा। यह सभी के लिए खतरे का अलार्म है गांव से लेकर शहर तक कोरोना संक्रमण तेजी से फैल रहा है। 

आज दिल्ली में मरने वालों की संख्या हर घंटे 4 लोगों की है। जिन लोगों ने इस बीमारी की वजह से अपनों को खोया है उनके दर्द को समझा जा सकता है। शमशान घाट पर अंतिम संस्कार के लिए भी लंबी लंबी लाइनें देखी जा सकती हैं। घंटों तक पीपीई किट में खड़े लोगों के आंसुओं को कोरोना सुखाए दे रहा है। दोस्त, पड़ोसी और रिश्तेदार अंतिम संस्कार के वक्त मौजूद नहीं है। कब्रिस्तानों में जगह खाली नहीं है और हम हैं कि मानते नहीं हैं। कोरोना इतनी तेजी से चपेट में ले रहा है कि संभलने का मौका तक नहीं मिल रहा है। अस्पतालों के हालात ऐसे हो चुके हैं कि दूसरी बीमारियों के मरीजों को इलाज मिलने में मुश्किल हो रही है।  

मौजूदा हालातों ने एक बात तो साबित की है कि कोरोना जागरूकता पर खर्च किया जाने वाला पैसा बर्बादी ही है। इसलिए सरकार को मास्क ना लगाने पर जुर्माने का रास्ता अपनाना पड़ा। आपको जानकर हैरानी होगी कि दिल्ली पुलिस ने अब तक 24 करोड़ से ज्यादा लोगों से जुर्माना वसूल लिया है लेकिन हम है कि मानते ही नहीं है।

आपदाएं, महामारियां आदम और हव्वा की संतानों का नसीब रही हैं, पर ये महा-बदनसीबी के दिन हैं। कोविड-19 ने धरती को अभूतपूर्व संकट में    झोंक दिया है। कोविड ने डब्ल्यू एच ओ पर भी सवालिया निशान लगा दिए हैं। इसके अस्तित्व और कार्य प्रणाली पर नये सिरे से बहस चल रही है। आखिर क्यों यह संस्था समय रहते इससे निपटने के कारगर उपाय नहीं ढूंढ पाई। क्यों यह समय से सटीक चेतावनी और गाइडलाइंस जारी नहीं कर पाई। 

दुनिया के लिए ये हालात दुखद हैं, क्योंकि इस संगठन ने अतीत में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है। स्मॉलपॉक्स के उन्मूलन और पोलियो पर सार्थक लगाम लगाने के मामले में डब्ल्यूएचओ की भूमिका बहुत बड़ी है। हमें ऐसी संस्थाओं की जरूरत है।

आइए आपको थोड़ा से कारोना के अतीत में लेकर चलता हूं कि इसी साल मार्च अप्रैल में लाॅकडाउन के वक्त क्या हालात थे। लॉकडाउन शुरू होने के बाद से लेकर अब तक की सबसे भयावह जो तस्वीर है, वो है मजदूरों के पलायन की और शमशान घाट की। ये मजदूर चले जा रहे थे, बस चले जा रहे थे, ट्रेनों के नीचे कट रहे थे, सड़कों पर हादसों का शिकार हुए जा रहे थे, भूख से तड़प रहे थे कभी प्यास से बिलख रहे थे. असल में इनकी सुध लेने वाला कोई नहीं था। और अब शमशान घाटों पर लंबी लंबी लाइनें हैं अंतिम संस्कारों के लिए।   


इसलिए आपको सोचना होगा, समझना होगा कि इस महामारी से बचने के लिए सर्तकता और बचाव ही उपाय है। वरना परिणाम आपके साथ साथ आपका यह समाज भी भुगतेगा। यह लड़ाई इंसानी सभ्यता को बचाने की है क्योंकि कोरोना अभी जिंदा है। 

   


  

Posted by ajay sharma at 11/23/2020 01:17:00 PM No comments:

Sunday, December 14, 2014

महिलाओं को सुरक्षा और अधिकार के लिए चेतना होगा

मित्रों,हम आज महिलाओं के अधिकार, उनके मान-सम्मान और सुरक्षा को लेकर देश के प्रमुख कानूनों के बारे में विस्तार से चर्चा करगें। हम वैसी घटनाओं और हरकतों को लेकर कानून के प्रावधानों की चर्चा कर रहे हैं, जिन्हें आमतौर पर महिलाएं चुपचाप सहन कर लेती हैं, जबकि इनसे निबटने के लिए कानून और सहायता उपलब्ध हैं। महिलाएं चाहें, तो उनकी मदद ले सकती हैं और शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक और आर्थिक उत्पीड़न से खुद को बचा सकती हैं। छेड़छाड़, मेले-ठेले में पुरुषों द्वारा जानबूझ कर की जाने वाली धक्का-मुक्की, ईल टिप्पणी और इशारे महिलाओं को आतंकित करने वाली घटनाएं हैं। ऐसी घटनाओं के खिलाफ कानूनी कार्रवाई संभव है। उसी तरह ससुराल में घर के अंदर किये जाने वाले अमानवीय व्यवहार को रोकने की भी कानूनी व्यवस्था है। दहेज उत्पीड़न को लेकर तो कानून और अदालत बेहद संवेदनशील है। इन सब का लाभ लिया जाना चाहिए। विवाह का निबंधन भी जरूरी है. यह पुरुष और महिला दोनों के हित में हैं। आज हम इसी पर चर्चा कर रहे हैं।



अनिवार्य विवाह निबंधन
विवाह जीवन और समाज की एक सामान्य और जरूरी संस्कार है. सदियों से चली आ रही इस रस्म को पूरा करने में आम तौर पर किसी कानून को बीच में नहीं लाया जाता, लेकिन इसके लिए भी कानून है, जो विवाह को अपनी (कानूनी) मान्यता देता है. इसमें विवाह के पंजीयन का प्रावधान है. भारत में विवाह आमतौर पर हिंदू विवाह अधिनियम 1955 या विशेष विवाह अधिनियम 1954 में से किसी एक अधिनियम के तहत पंजीकृत किया जा सकता है, लेकिन कोई भी कानून बाल विवाह या कम उम्र में विवाह को मान्यता नहीं देता.

विवाह को कानूनी मान्यता : कानूनी तौर पर विवाह के लिए पुरुष की न्यूनतम आयु 21 वर्ष और महिला की न्यूनतम आयु 18 वर्ष होनी चाहिए. हिंदू विवाह के दोनों पक्षों (वर और वधु) को अविवाहित या तलाकशुदा होने चाहिए. यदि विवाह पहले हो गया है, तो उस शादी की पहली पत्नी या पति जीवित नहीं होने चाहिए. यानी एक पति या एक पत्नी के जीवित रहते तभी दूसरी शादी को कानून मान्यता देता है जिसमें पहली शादी को लेकर तलाक हो चुका हो. इसके अतिरिक्त दोनों पक्षों को शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ होने चाहिए. विशेष विवाह अधिनियम विवाह अधिकारी द्वारा विवाह संपन्न करने तथा पंजीकरण करने की व्यवस्था करता है.

विवाह प्रमाण-पत्र क्या है
जब किसी विवाह का पंजीयन यानी रजिस्ट्रेशन होता है, तो पंजीकरण का प्रमाण-पत्र दिया जाता है. इसका लाभ यह है कि दोनों पक्षों के विवाह बंधन में बंधने का कानूनी सबूत तैयार होता है. दूसरा कि पासपोर्ट बनवाने, अपना धर्म, गोत्र आदि बदलने के मामले में यह जरूरी दस्तावेज होता है.

दहेज उत्पीड़न
यह सर्वविदित है कि दहेज एक सामाजिक अभिशाप और कानूनी अपराध है. यह महिला प्रताड़ना और उत्पीड़न का बड़ा कारण है. भारतीय दंड संहिता की धारा 304(बी) तथा दहेज प्रतिषेध अधिनियम 1961 के तहत दहेज लेना और देना दोनों अपराध है. ऐसे अपराध की सजा कम-से-कम पांच वर्ष कैद या कम-से-कम पंद्रह हजार रुपये जुर्माना है. दहेज की मांग करने पर छह माह की कैद की सजा और दस हजार रुपये तक का जुर्माना किया जाता है. साथ ही, दहेज के नाम पर किसी भी प्रकार के मानसिक, शारीरिक, मौखिक तथा आर्थिक उत्पीड़न को अपराध के दायरे में रखा गया है.

दहेज हत्या से जुड़े कानूनी प्रावधान
दहेज हत्या को लेकर भारतीय दंड संहिता यानी आइपीसी में स्पष्ट प्रावधान है. इसके लिए संहिता की धारा 304(बी), 302, 306 एवं 498-ए है.

भारतीय दंड संहिता की धारा 304(बी)
भारतीय दंड संहिता की धारा 304(बी) दहेज हत्या के मामलों में सजा के लिए लागू की जाती है. दहेज हत्या का अर्थ है औरत की जलने या किसी शारीरिक चोट के कारण हुई मौत या शादी के सात साल के अंदर किन्हीं संदेहास्पद कारण से हुई उसकी मृत्यु. दहेज हत्या की सजा सात साल कैद है. इस जुर्म के अभियुक्त को जमानत नहीं मिलती है.

भारतीय दंड संहिता की धारा 302
संहिता की धारा 302 में दहेज हत्या के मामले में सजा का प्रावधान है. इसके तहत किसी औरत की दहेज हत्या के अभियुक्त का अदालत में अपराध सिद्ध होने  पर उसे उम्र कैद या फांसी हो सकती है.

भारतीय दंड संहिता की धारा 306
अगर ससुराल वाले किसी औरत को दहेज के लिए मानसिक या भावनात्मक रूप से हिंसा का शिकार बनाते हैं और  इस कारण वह आत्महत्या कर लेती है, तो वहां भारतीय दंड संहिता की धारा 306 के तहत उसे सजा मिलती है. इसके तहत दोष साबित होने पर अभियुक्त को महिला द्वारा आत्महत्या के लिए मजबूर करने के अपराध के लिए जुर्माना और 10 साल तक की सजा सुनायी जा सकती है.

भारतीय दंड संहिता की धारा 498-ए
पति या रिश्तेदारों द्वारा दहेज के लालच में महिला के साथ क्रूरता और हिंसा का व्यवहार करने पर संहिता की धारा-498ए के तहत कठोर दंड का प्रावधान है. यहां क्रूरता के मायने हैं- औरत को आत्महत्या के लिए मजबूर करना, उसकी जिंदगी के लिए खतरा पैदा करना व दहेज के लिए सताना व हिंसा.

विवाह प्रमाण-पत्र कैसे प्राप्त करें
हिंदू विवाह अधिनियम 1955 के तहत विवाह के लिए पक्षों (वर और वधु) को, अपने क्षेत्र के विवाह पंजीयक यानी मैरेज रजिस्ट्रार के पास आवेदन देना होता है. यह पंजीयक उस क्षेत्र का हो सकता है, जहां विवाह संस्कार संपन्न हो रहा है या फिर जिस पंजीयक के अधिकार क्षेत्र में दोनों में से कोई पक्ष विवाह में ठीक पहले लगातार छह माह तक रह रहा हो. दोनों पक्षों को पंजीयक के पास विवाह के एक माह के भीतर अपने माता-पिता या अभिभावकों या अन्य गवाहों के साथ उपस्थित होना होता है. अगर कोई शादी संपन्न हो चुकी है और उस समय उसका पंजीयन नहीं कराया  गया, तो वैसे विवाह के पंजीयन के लिए वैसे दंपति को पांच वर्ष तक माफी की पंजीयक और उसके बाद जिला रजिस्ट्रार द्वारा दी जाती है.

विशेष विवाह
विशेष विवाह अधिनियम के तहत पंजीयन के लिए यह जरूरी है कि पंजीयक को विवाह के पंजीयन का आवेदन देने के कम-से-कम 30 दिनों तक कम-से-कम एक पक्ष को उसके क्षेत्रधिकार में रहा होना चाहिए. यदि कोई एक पक्ष दूसरे विवाह अधिकारी के क्षेत्र में रह रहा है, तो नोटिस की प्रति उसके पास भेज दी जाती है. किसी प्रकार की आपत्ति नहीं प्राप्त होने पर सूचना प्रकाशित होने के एक माह के बाद विवाह संपन्न किया जा सकता है. यदि कोई आपत्ति प्राप्त होती है, तो विवाह अधिकारी इसकी जांच करता है. विवाह संपन्न होने के बाद पंजीकरण (रजिस्ट्रेशन) किया जाता है. अगर पहले से शादी हो चुकी है, तो वैसे मामले में 30 दिनों की सार्वजनिक सूचना देने के बाद विशेष विवाह अधिनियम 1954 के अधीन विवाह का पंजीकरण किया जाता है.



महिलाओं को हैं पुरुषों के बराबर अधिकार


महिलाएँ अपने अधिकारों का सही इस्तेमाल नहीं कर पातीं, अदालत जाना तो दूर की बात है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि महिलाएँ खुद को इतना स्वतंत्र नहीं समझतीं कि इतना बड़ा कदम उठा सकें। जो किसी मजबूरी में (या साहस के चलते) अदालत जा भी पहुँचती हैं, उनके लिए कानून की पेंचीदा गलियों में भटकना आसान नहीं होता।

दूसरे, इसमें उन्हें किसी का सहारा या समर्थन भी नहीं मिलता। इसके कारण उन्हें घर से लेकर बाहर तक विरोध के ऐसे बवंडर का सामना करना पड़ता है, जिसका सामना अकेले करना उनके लिए कठिन हो जाता है।

इस नकारात्मक वातावरण का सामना करने के बजाए वे अन्याय सहते रहना बेहतर समझती हैं। कानून होते हुए भी वे उसकी मदद नहीं ले पाती हैं। आमतौर पर लोग आज भी औरतों को दोयम दर्जे का नागरिक ही मानते हैं। कारण चाहे सामाजिक रहे हों या आर्थिक, परिणाम हमारे सामने हैं। आज भी दहेज के लिए हमारे देश में हजारों लड़कियाँ जलाई जा रही हैं। रोज न जाने कितनी ही लड़कियों को यौन शोषण की शारीरिक और मानसिक यातना से गुजरना पड़ता है। कितनी ही महिलाएँ अपनी संपत्ति से बेदखल होकर दर-दर भटकने को मजबूर हैं।
 
महिलाएँ अपने अधिकारों का सही इस्तेमाल नहीं कर पातीं, अदालत जाना तो दूर की बात है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि महिलाएँ खुद को इतना स्वतंत्र नहीं समझतीं कि इतना बड़ा कदम उठा सकें।    


महिला श्रमिकों का गाँव से लेकर शहरों तक आर्थिक व दैहिक शोषण होना आम बात है। अगर इन अपराधों की सूची तैयार की जाए तो न जाने कितने पन्ने भर जाएँगे। ऐसा नहीं है कि सरकार को इन अत्याचारों की जानकारी नहीं है या फिर इनसे सुरक्षा के लिए कोई कानून नहीं है। जानकारी भी है और कानून भी हैं, मगर महत्वपूर्ण यह है कि इन कानूनों के बारे में आम महिलाएँ कितनी जागरूक हैं? वे अपने हक के लिए इन कानूनों का कितना उपयोग कर पाती हैं?

सब यह जानते हैं कि संविधान ने महिलाओं को पुरुषों के बराबर अधिकार दिए हैं। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 में कहा गया है कि कानून के सामने स्त्री और पुरुष दोनों बराबर हैं। अनुच्छेद 15 के अंतर्गत महिलाओं को भेदभाव के विरुद्ध न्याय का अधिकार प्राप्त है। संविधान द्वारा दिए गए अधिकारों के अलावा भी समय-समय पर महिलाओं की अस्मिता और मान-सम्मान की रक्षा के लिए कानून बनाए गए हैं, मगर क्या महिलाएँ अपने प्रति हो रहे अन्याय के खिलाफ न्यायालय के द्वार पर दस्तक दे पाती हैं?

साक्षरता और जागरूकता के अभाव में महिलाएँ अपने खिलाफ होने वाले अन्याय के विरुद्ध आवाज ही नहीं उठा पातीं। शायद यही सच भी है। भारत में साक्षर महिलाओं का प्रतिशत 54 के आसपास है और गाँवों में तो यह प्रतिशत और भी कम है। तिस पर जो साक्षर हैं, वे जागरूक भी हों, यह भी कोई जरूरी नहीं है। पुराने संस्कारों मेंजकड़ी महिलाएँ अन्याय और अत्याचार को ही अपनी नियति मान लेती हैं और इसीलिए कानूनी मामलों में कम ही रुचि लेती हैं।

हमारी न्यायिक प्रक्रिया इतनी जटिल, लंबी और खर्चीली है कि आम आदमी इससे बचना चाहता है। अगर कोई महिला हिम्मत करके कानूनी कार्रवाई के लिए आगे आती भी है, तो थोड़े ही दिनों में कानूनी प्रक्रिया की जटिलता के चलते उसका सारा उत्साह खत्म हो जाता है। अगर तह में जाकर देखें तो इस समस्या के कारण हमारे सामाजिक ढाँचे में भी नजर आते हैं। महिलाएँ लोक-लाज के डर से अपने दैहिक शोषण के मामले कम ही दर्ज करवाती हैं। संपत्ति से जुड़े हुए मामलों में महिलाएँ भावनात्मक होकर सोचती हैं।

वे अपने परिवार वालों के खिलाफ जाने से बचना चाहती हैं, इसीलिए अपने अधिकारों के लिए दावा नहीं करतीं। लेकिन एक बात जान लें कि जो अपनी मदद खुद नहीं करता, उसकी मदद ईश्वर भी नहीं करता अर्थात अपने साथ होने वाले अन्याय, अत्याचार से छुटकारा पाने के लिए खुद महिलाओं को ही आगे आना होगा। उन्हें इस अत्याचार, अन्याय के विरुद्ध आवाज उठानी होगी।

साथ ही समाज को भी महिलाओं के प्रति अपने दृष्टिकोण में बदलाव लाना होगा। वे भी एक इंसान हैं और एक इंसान के साथ जैसा व्यवहार होना चाहिए वैसा ही उनके साथ भी किया जाए तो फिर शायद वे न्यायपूर्ण और सम्मानजनक जीवन जी सकेंगी।
Posted by ajay sharma at 12/14/2014 05:45:00 PM No comments:

Saturday, October 5, 2013

मैं लडूंगा इंसाफ के लिए कटारा की मां की तरह


साहिबाबाद, अजय शर्मा 

साहिबाबाद के शालीमार गार्डन निवासी चिरंजीवी लाल ने अपने पुत्र की संदिग्ध मौत जिसे आत्महत्या का नाम देकर तफ्तीश की गई, उसमें  साहिबाबाद पुलिस पर लापरवाही का आरोप लगया है। मृतक के पिता के मुताबिक यदि पुलिस सही ढंग से जांच करती तो परिणाम अवश्य निकलता।

 चिरंजीवी लाल ने अपनी एफआईआर में डीएवी स्कूल ब्रिज विहार और मृतक के स्थानीय जानकार व्यक्ति ओमकेश्वर त्यागी पर आरोप लगाते हुए जांच की मांग की थी लेकिन पुलिस ने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया। मृतक के पिता ने डीएवी स्कूल ब्रिज विहार पर आरोप लगाते हुए कहा कि स्कूल ने मेरे बच्चे को इतना प्रताडि़त किया कि उसने आत्महत्या जैसा शायद कदम उठा लिया।

इस केस के आई ओ रहे हिंडन पुल चौकी इंचार्ज दिलीप कुमार ने उस वक्त एक मुलाकात में कहा था कि पुलिस सिर्फ आरोपों की जांच करती है न कि उसका काम सामाजिक कारण ढूंढने का है। जब उनसे पूछा गया कि क्या उन्होंने सभी आरोपियों से जांच पड़ताल कर ली है। तो उन्होंने कहा था कि अभी नहीं।

चिरंजीवी लाल के मुताबिक घटना स्थल पर कुछ तथ्य ऐसे थे जिनकी पुलिस ने अनदेखी की। जो निम्न बिंदुवार हैं---

1 जब मेरे बच्चे को पंखे से उतारा गया तो पंखे की मोटर चल रही थी।
2 मेरे बच्चे का कद लगभग 6 फुट था और कमरे की उंचाई ज्यादा नहीं थी इसलिए उसे सिलेंडर पर चढ़कर फांसी के फंदे पर झूलने की आवश्यकता नहीं थी।
3 कमरे की बालकनी की खिड़की खुली हुई थी जिससे यह अंदेशा होता है कि वहां से कोई आ या जा सकता है। क्योंकि यह सड़क पर खुलती है जिससे कोई भी कूद कर भाग सकता है।


इस मामले पर सीओ बार्डर अरविंद यादव ने कहा है कि इस केस में कुछ नहीं पाया गया है। इसलिए इस पर एफआर लगा दी गई है। वहीं पिता ने कहा है कि मेरे पास कुछ खोने के लिए कुछ नहीं बचा है। मैं इस लड़ाई को नीतीश कटारा की मां की तरह लडूंगा और दोषियों को सजा दिलवा कर रहूंगा। 
Posted by ajay sharma at 10/05/2013 08:38:00 PM 1 comment:

अभी भी रहस्य है वृद्धा की हत्या


साहिबाबाद, अजय शर्मा 

साहिबाबाद के राधे श्याम पार्क में बुजुर्ग महिला (86) की हत्या की गुत्थी अभी भी उलझी हुई है। पुलिस की जांच काफी सुस्त गति से चल रही है। साहिबाबाद पुलिस की थ्योरी के मुताबिक हत्यारों ने बुजुर्ग महिला को घर के दरवाजे पर ही कवर कर लिया था और वृद्धा को ड्राइंग रुम में

सोफे पर बैठाकर तसल्ली से तेज धारदार चाकू से गला रेत कर हत्या कर दी। सब इंस्पेक्टर राजपाल के मुताबिक हत्यारे काफी क्रूर प्रवृत्ति के रहे होंगे क्योंकि उन्होंने वृद्धा के गले पर बड़ी निर्ममता के साथ 9 वार किये और साथ ही एक वार पीठ के पर और एक पेट के पास। यह हत्या लूट या प्रापर्टी विवाद में तो नहीं गई है। सब इंस्पेक्टर ने कहा कि अभी जांच चल रही है। जल्द ही खुलासा हो जाएगा।

वहीं दूसरी ओर मृतका के पुत्र दीपकमल ने हत्या करवाने का शक अपनी पत्नी पर जाहिर किया है। उसके मुताबिक सास-बहु के संबध अच्छे नहीं थे। इस वजह से भी वह मेरी मां की हत्या करवा सकती है।

मृतका की पुत्रवधु ने बताया कि उसका दीपकमल के साथ गाजियाबाद कोर्ट में तलाक का मुकदमा चल रहा है और वह पिछले 8 महीने से अपने पति से अलग रह रही है। दीपकमल (पति) ने मारपीट कर उसे और बच्चे को घर से निकाल दिया था। हर रोज उसे प्रताडि़त करना, मारपीट करना उसके पति के व्यवहार में शामिल था।

इस वारदात पर सीओ बार्डर अरविंद कुमार यादव का कहना है कि अभी जांच पूरी होने दीजिए। तभी कुछ कह पाएंगे।
Posted by ajay sharma at 10/05/2013 08:36:00 PM No comments:

Saturday, January 12, 2013

जुवेलाइन की उम्र पर फिर से हो संशोधन



वसंत विहार गैंगरेप हादसे के बाद आरोपियों को सजा देने के लिए न्यायिक प्रक्रिया तेज हो चुकी है। लेकिन इसी बीच नाबालिग आरोपी की सजा को लेकर महिला संगठनों के साथ साथ आहत लोगों ने जुवेलाइन की उम्र को फिर से संशोधित करने की आवाज उठाना शुरु कर दिया है। गौरतलब है कि नाबालिग अपराधियों की सजा की सुनवाई जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड करता है। जिसके मानदंडों के मुताबिक नाबालिग अपराधियों को जेल की सजा की बजाय बाल सुधार गृह भेजा जाता है। नियमों के मुताबिक ऐसे अपराधियों को तीन साल से अधिक सजा नहीं दी जा सकती। ऐसे अपराधियों में उनसे जुड़ी जानकारी जैसे माता-पिता का नाम, स्कूल का ब्यौरा और पहचान सार्वजनिक नहीं की जाती है। साथ ही जुवेलाइन को 18 साल का होने से पहले सुधार गृह से रिहा भी करना पड़ता है। लेकिन इस वीभत्स गैंगरेप में क्रूरतम नाबालिग आरोपी ने इस पर फिर से सोचने के लिए मजबूर कर दिया है। अब तक बलात्कार के ऐसे सैंकड़ों मामले देश भर से खबरों की दुनिया में अखबार और न्यूज चैनल के जरिए लोगों तक पहुंचे हैं जिसे नाबालिगों ने अंजाम दिया है।


ऐसे नाबालिगों पर दिल्ली निवासी ज्योति ने अपना कड़वा अनुभव साझा किया। ज्योति ने बातचीत में बताया कि ऐसे लड़कों से उनका और उनकी दोस्तों का भी सामना हुआ है। ये महिलाओं और युवतियों को पब्लिक प्रॉपर्टी की तरह लेते हैं। बदतमीजी, अश्लील व्यवहार, ईव टीजिंग, द्विअर्थी फिकरे, पीछा करना इनकी बीमार मानसिकता है। ये कहीं भी आपको मिल सकते हैं जैसे पब्लिक प्लेस, वर्किंग प्लेस, स्कूल कॉलेज के आस-पास, मेट्रो, बस स्टॉप और सिटी बसों के अंदर भी। मतलब ये आपको कहीं भी मिल सकते हैं किसी भी रुप में। बड़े ही आश्चर्य की बात है इनकी उम्र 13 से 18 के बीच है। ये किस तरह की परवरिश और मानसिकता है। जिसने इन नाबालिगों को ऐसा बना दिया है। इन बच्चों को कानून और सजा का भी कोई डर नहीं है। जिसकी वजह से महिलाएं किसी भी उम्र के पुरुष से सुरक्षित नहीं है। हमें तो लगता हैं कि हम एक सड़े और बीमार समाज में रह रहें हैं।

मैं दूसरों के अनुभवों की क्या बात करुं जब मैंने खुद ऐसे बच्चों को इस तरह के व्यवहार में देखा है। मुझे दिल्ली के अलावा उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड जाने का मौका मिला और कमोबेश वहां भी महिलाओं के साथ नाबालिगों का ऐसा ही व्यवहार देखने के लिए मिला। जो सोचने पर मजबूर करता है कि ऐसे हालात सिर्फ दिल्ली में ही नहीं है। इसलिए परवरिश के साथ-साथ कानून में संशोधन की आवश्यकता है। ऐसे में जुवेलाइन की उम्र को संशोधित करते हुए फिर से 16 साल करने पर गंभीरता से विचार करना होगा।
Posted by ajay sharma at 1/12/2013 08:21:00 PM No comments:

Wednesday, December 12, 2012

मेरी अलीगढ़ यात्रा



मुझे उत्तर प्रदेश का जिला अलीगढ़ जाने का मौका मिला। मैं थोड़ा सा उत्सुक था क्योंकि इस शहर के बारे में सिर्फ सुना था कि यह शहर तालों, गुण्डागर्दी और धार्मिक उन्माद के लिए जाना जाता है। मेरे कुछ पुराने दोस्त बताया करते थे कि घर में खाने के लिए हो या ना हो लेकिन कंधे पर बंदूक ज़रुर होगी।

इसलिए दोस्तों हम सुबह सुबह रेलवे स्टेशन पहुंच गए। लेकिन भाग्य से हमारी ट्रेन छूट गई और हमें दोपहर की ट्रेन से जाना पड़ा। गाजियाबाद में दोपहर 1.10 मिनट पर नई दिल्ली-लखनऊ गोमती सुपर फास्ट ट्रेन से अलीगढ़ की यात्रा करने के लिए पहुंच गए। लगभग 12.30 के समय मैं गाजियाबाद के रेलवे स्टेशन पर पहुंचा और जो वहां पर मैंने देखा और गाजियाबाद से अलीगढ़ की यात्रा मैं पूरी जिदंगी भुला नहीं पाउंगा। इस यात्रा में मैंने बहुत से अनुभव किए। जीवन के कई रंग देखे। जिस देश में करोड़ों और अरबों के घोटाले हो रहे हों उस देश के नागरिकों की हालत कितनी दयनीय है। वो किस तरह की यात्रा करने पर मजबूर हैं।

जब ट्रेन के आने की उदघोषणा हुई तो प्लेटफार्म पर जाने वाले यात्रियों की भीड़ जमा हो गई। भीड़ देखकर मैं अचंभित था। हे भगवान इतनी भीड़। ट्रेन जब प्लेटफार्म पर आई तो उसकी सभी बोगियां ठसाठस भरी हुई। आप इतनी भीड़ देखकर अंदाजा लगा सकते थे कि इसमें चढ़ना बहुत ही मुश्किल होगा लेकिन भीड़ फिर इसमें चढ़ ही गई। मैं भी इसमें चढ़ ही गया। अंदर की भीड़ के देखकर मैं हैरान था। लोग एक दूसरे पर चढ़े हुए से थे। मैं यही सोच रहा था कि रिजर्वेशन बोगी में भी इतनी भीड़। लोग उक दूसरे से सीट के लिए लड़ रहे थे। जिनके पास रिजर्वेशन टिकट था वो सीट के लिए लड़ रहे थे। कुछ बच्चे और महिलाएं सीट के पास नीचे ही बैठ गए। पूरे रास्ते चाय, पानी और सनैक्स वाले इस भीड़ को चीरकर आते जाते रहे। कुछ मनचले भीड़ का फयदा उठाते हुए कुछ महिलाओं और लड़कियों के बदन से पूरी तरह से सटे हुए थे। मनचलों का बस चलता तो वे सबकुछ ट्रेन में ही सबकुछ कर डालते। असहाय सी ये महिलाएं।

मैं यही सोचता रहा-- कैसी है ये जिदंगी और हमारी सरकार जो नागरिकों को सुविधाएं तक नहीं दे सकती।  
Posted by ajay sharma at 12/12/2012 09:41:00 PM No comments:

Sunday, August 12, 2012

निकाय चुनाव विद नोट,शराब और धांधलेबाजी



यूपी के नगर निकाय चुनाव संपन्न हो चुके हैं लेकिन उसकी तपिश अभी तक बरकरार है। जीत का नशा प्रतिनिधियों के सिर चढ़कर बोल रहा है। पैर जमीन पर नहीं हैं। नशा ऐसा चढ़ा है कि उतरने का नाम नहीं ले रहा है। कुछ जन प्रतिनिधि जीत का हनीमून मानने में व्यस्त हैं।  जो हार गए हैं वह अपनी किस्मत या जीते हुए प्रत्याशी पर तिकड़मबाजी का आरोप लगा कर फ्रशटेशन निकाल रहे हैं। कार्यकत्ता चुनाव की समीक्षा करने में लगे हुए हैं। नगर निगम और विकास प्राधिकरण के कर्मचारी अपने चिरपरिचित अंदाज में चाटूकारिता में लग गए हैं। सभी नये जन प्रतिनिधियों का दरबार सज गया है। ये पार्षद अपनी अपनी गोटियां सेट करने में लग चुके हैं। इन के घर और दफ्तर का माहौल ऐसा है जैसे युवराज का राज्याभिषेक हुआ हो। वहीं हारे हुए पार्षदों का घर और आंगन सूना पड़ा हुआ है।

इस निकाय चुनाव में काफी दिलचस्प मामले भी देखने को मिले। इस निकाय चुनाव में सभी हथकंडों का जमकर उपयोग किया गया। शराब और नोट का खेल भी खूब खेला गया। प्रतियोगी उम्मीदवारों ने फर्जी वोट बैंक तैयार करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। खाली पड़े प्लाटों और बंद मकानों पर सैकड़ों वोट तैयार किए गए। राजनैतिक पैंतरे बाजी में वोटरों के नाम तक वोटर लिस्ट से उड़ा तक दिए गए। वोटरों को रिझाने के लिए सभी चुनावी वायदों के साथ साथ प्रतियोगियों के आपस एक दूसरे पर आरोप और प्रत्यारोप का भी खेल देखने को मिला। जमीनी स्तर के इस चुनाव में पदयात्रा, गोपनीय गोष्ठियां, डोर टू डोर जनसंपर्क, जनसमूहों के नेता या ठेकेदारों से वोटों की खरीद-फरोख्त तक का सहारा लिया गया। वोटों के ठेकेदारों ने भी खूब जमकर धन लूटा। इस चुनाव में चुनाव आयोग को जमकर अंगूठा दिखया गया। उम्मीदवारों के सामने प्रशासन ने अपने आपको बौना और कमजोर दिखाया। होर्डिंग और पोस्टरबाजी की होड़ में शहर को जमकर सजाया गया। इस चुनावी मौसम में वोटों के ठेकेदार दलाली करते नजर हर खेमे में नजर आ रहे थे।




इस सभी के बीच विचलित करने बाली बात जो सामने आई वह थी महिला उम्मीदवारों के साथ अभ्रदता, बदसलूकी, गाली गलौच, डराना धमकाना और सहयोगी कार्यकत्ताओं के द्वारा कामलोलूप नजरों से घूरना। फिर भी महिला उम्मीदवारों ने हिम्मत नहीं हारी और चुनाव लड़ा। इन महिलाओं के साथ-साथ परिवारों की भी बड़ी ही अहम भूमिका रही। जिन्होंने साहस बांधे रखा। इस चुनाव में कुछ हादसे ऐसे थे जो मेरे ही सामने घटे और मैं इस समाज की विकृत मानसिकता और गिरते आचरण को लेकर स्तबध रह गया। कई रातों तक मैं सो नही सका। यही सोचता रहा यह कैसा समाज है जिसमें कोई लोक लिहाज नहीं बचा है। उस महिला उम्मीदवार के पति के वे शब्द जो उसने दूसरी महिला प्रत्याशी से पोलिंग वाले दिन सार्वजनिक रुप से कहे। " तू तो रंडी है। तू तो धंधा करती है।" इन शब्दों के साथ भद्दी भद्दी गालियां जो रुकने का नाम नहीं ले रही थी। इस घटना ने इस महिला को कितना अपमानित किया होगा। उसने यह कैसे सहा होगा। इसके जवान बेटे का खून नहीं खौला होगा कि एक आदमी उसकी माँ को भद्दी भद्दी गालियां दे रहा है। मैं यही सोचता रहा कि इस परिवार पर क्या बीत रही होगी। ये लोग कैसे इसका सामना कर रहे होगे। लेकिन दूसरी तरफ यह भी ख्याल आया कि यह महिला उम्मीदवार और इसका परिवार क्या सोच रहा है। इस तरह के बेहूदा आरोपों पर इस महिला की चुप्पी की क्या मजबूरियां हैं। इस पर फैसला देने वाला मैं कौन होता हूं।



इस नगर निकाय चुनाव के दौरान में काफी लोगों से मिला। इस चुनाव और प्रत्याशियों को करीब से जानने की कोशिश की। एक बहुत ही संभ्रात परिवार की महिला उममीदवार से मैंने उसका राजनीति का पहला तजुर्बा पूछा तो उसने कहा कि " सिर्फ कूटनीति और सिर्फ कूटनीति" मैंने उसका निराशा से भरा हुआ उदास चेहरा देखा। उसके चेहरे पर वेदना साफ झलक रही थी कि उसने क्या क्या सहा है।

ऐसे ही मैं एक बहुत ही वृद्ध महिला उम्मीदवार से मिला जिसका जोश देखकर मैं दंग रह गया। यह वृद्धा 70 वर्ष की उम्र में समाज के लिए कुछ करना चाहती है। यह समाज को एक नई दिशा देना चाहती है। लेकिन इस वृद्धा का अनुभव भी वैसा ही रहा। लोग उन्हें रात को 12 बजे धमकाने पहुंचे।

इससे समझ में आता है कि आज भी तमाम कारणों से ज्यादातर स्त्रियां पुरुष की बदसलूकी और हैवानियत सहने को मजबूर हैं। क्या मजबूरी है? कौन सा डर है जो यह सब सहने को मजबूर करता है। खैर चुनाव तमाम गड़बडि़यां, लड़ाई झगड़े, मारपीट और चुनावी रंजिश के साथ संपन्न हो चुका है। लेकिन हमेशा की तरह यह अपने पीछे कुछ सवाल छोड़ गया है।
Posted by ajay sharma at 8/12/2012 06:55:00 PM No comments:

Sunday, April 4, 2010

बसपा और कांग्रेस में दलित वोटों के लिए घमासान

उत्तर प्रदेश में 2012 के प्रस्तावित विधानसभा चुनाव को लेकर दलित वोटों के लिए कांग्रेस और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) में रस्साकसी चरम पर है। इसके लिए दोनों में अक्सर टकराव की नौबत भी बन जाती है। बसपा अपने इस मूल वोट बैंक को हर हाल में संजोए रखना चाहती है जबकि कांग्रेस महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) तथा अन्य कार्यक्रमों के जरिए इस वोट बैंक को दोबारा अपने पाले में लाकर बसपा का एकाधिकार हर हाल में समाप्त करने पर तुली है।


डा. भीमराव अम्बेडकर की जयन्ती पर उनके नाम से 27 सितम्बर 1995 को घोषित अम्बेडकर नगर जिले से कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी एक बडी रैली आयोजित करने जा रहे हैं। रैली के बाद वहीं से वह पहले चरण में 31 मई तक चलने वाली दस रथयात्राओं को राज्य के विभिन्न क्षेत्रों के लिए हरी झण्डी दिखाकर रवाना करेंगें। राज्य के विभिन्न जिलों में जाने वाली यात्राओं के दौरान होने वाली सभाओं को कई केन्द्रीय मंत्री कुछ राज्यों के मुख्यमंत्री तथा पार्टी के वरिष्ठ नेता सम्बोधित करेंगें। डा0 अम्बेडकर जयन्ती को शुरू हो रही यह यात्राएं स्वत चुनाव का सन्देश दे रही हैं। यह यात्राएं ज्यादातर दलित बाहुल्य क्षेत्रों से होकर गुजरेंगी। इसके रास्ते तय हो गए हैं। हर मंडलों में यात्रा प्रभारी की नियुक्ति तक हो गई है।

प्रदेश कांग्रेस के मीडिया विभाग के प्रमुख अखिलेश प्रताप सिंह इसे (एडवान्स इलेक्शन कम्पेन) मानते हैं। उनका कहना है कि इन यात्राओं को राज्य विधान सभा के 2012 में प्रस्तावित चुनाव की तैयारियों के रिहर्सल के तौर पर देखा जाना चाहिए। सिंह ने कहा कि यात्राओं के दौरान (मनरेगा) समेत अन्य केन्द्रीय योजनाओं को प्रचारित किया जाएगा। अन्य दलों की नीतियों पर भी प्रकाश डाला जाएगा। राज्य सरकार की विफलताओं को खासतौर पर उजागर किया जाएगा।


उन्होंने बताया कि यात्रा का मुख्य स्लोअन "अतीत की नींव पर भविष्य का निर्माण" है। उनका कहना था कि यात्रा का दूसरा चरण बरसात के बाद होगा। दूसरे चरण की यात्रा में नवम्बर में सोनिया गांधी इलाहाबाद में शामिल होंगी। अम्बेडकर जयन्ती पर ही बसपा ने भी राज्यव्यापी धरना प्रदर्शन की घोषणा कर रखी है। अम्बेडकर नगर में कांग्रेस और बसपा के कार्यक्रम स्थल को लेकर टकराव की भी सूचनाएं आई थीं। बसपा अपने कार्यक्रमों में खासतौर पर कांग्रेस को निशाने पर रखेगी। डा अम्बेडकर को कांग्रेसी शासन में भारत रत्न नहीं दिए जाने का भावनात्मक मुद्दा भी इसमें उठेगा।



बसपा ने पिछले 15 और 25 मार्च को अपने कार्यक्रमों में भी कांग्रेस पर हल्ला बोला था। मुख्यमंत्री और बसपा प्रमुख मायावती ने दलितों के बदतर हालात के लिए कांग्रेस को ही जिम्मेवार ठहराया था। मायावती ने राहुल गांधी के दलितों के घर जाने को भी नाटक ही करार दिया था। वह अपने मूल वोट बैंक को संजोए रखने के लिए कांग्रेस को कोसने में किसी भी सीमा तक जाने के लिए तैयार है। विधानसभा की तैयारियों के मद्देनजर इन दोनों दलों के साथ ही अन्य पार्टियां भी अपने अपने ढंग से तैयारियों को मूर्त रूप देने में लग गई हैं।



राज्य की प्रमुख विपक्षी दल समाजवादी पार्टी (सपा) पांच अप्रैल से मंडलीय सम्मेलनों की शुरुआत आगरा से कर रही है। यह सम्मेलन दो महीने तक चलेंगें। पिछले 23 मार्च को सपा की साइकिल यात्रा समाप्त हुई थी। जबकि 19 फरवरी को सपा अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव ने स्वयं गिरफ्तारी देकर कार्यकर्ताओं को अपने पुराने अन्दाज में आकर संघर्ष करने का सन्देश दिया था। यादव की कोशिश है कि मुस्लिम वोट हर हाल में उनकी पार्टी में बना रहे। इसके लिए उन्होंने आन्ध्र प्रदेश की तरह पूरे देश में मुसलमानों के आरक्षण की मांग उठा दी। उन्हें डर है कि लोकसभा के चुनाव की तरह मुस्लिम मतों की अच्छी खासी संख्या कहीं कांग्रेस में न न चली जाए। इसके लिए उन्होंने विवादित बाबरी ढांचे को गिराए जाने के लिए कांग्रेस को फिर से जिम्मेदार ठहराना शुरू कर दिया है।

मार्क्‍सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) ने आठ अप्रैल को जेल भरो आन्दोलन की घोषणा की है। माकपा महासचिव ने दो दिन पहले लखनऊ में यह ऐलान किया। मंहगाई के खिलाफ माकपा का यह आन्दोलन तो देशव्यापी है लेकिन इसी बहाने राजनीतिक दृष्टि से सबसे मजबूत समझे जाने वाले राज्य उत्तर प्रदेश में वह अपने पांव फिर से जमाना चाहती है। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने भ्रष्टाचार और मंहगाई के खिलाफ हस्ताक्षर अभियान चला रखा है। 26 मार्च से शुरू यह अभियान दस अप्रैल तक चलेगा। इसी बहाने उसके नेता गांव गांव जाकर अपने कार्यकर्ताओं में जागृति पैदा कर रहे हैं।



25 फरवरी को लखनऊ में भाजपा के कार्यकर्ताओं पर पुलिस ने बल प्रयोग किया था। भाजपा का मानना है कि इस तरह के आन्दोलन से ही विधानसभा के चुनाव में उसे लाभ होगा। राज्य के पश्चिमी इलाकों में खासा प्रभाव रखने वाले राष्ट्रीय लोकदल (रालोद) ने अम्बेडकर जयन्ती की पूर्व संन्ध्या पर 13 अप्रैल को मंहगाई और राज्य सरकार के कथित भ्रष्टाचार के खिलाफ मशाल जुलूस निकालने की घोषणा की है। रालोद महासचिव मुन्ना सिंह चौहान का कहना है कि मशाल जुलूस के माध्यम से दल अपनी बात आम जनता को बताएगा। इसके साथ ही भूमि अधिग्रहण अधिनियम 1894 को निरस्त करवाने के लिए सभी दलों से सम्पर्क साधा जा रहा है। इससे कृषि प्रधान इस देश के किसानों का उन्हें जरूर समर्थन मिलेगा।
Posted by ajay sharma at 4/04/2010 08:19:00 PM No comments:
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Ajay Sharma (Ex.Sr. Sub Editor, Hindustan) I am a New Delhi-based journalist,creative writer and blogger in India. Journalism is my passion and I can never think of doing anything else in my life. I am the first generation journalist in my family and have practically devoted the best years of my life to this passion. I am born at Agra and brought up in Moradabad and Delhi-NCR. I live with my family in Ghaziabad which includes my parents. I am the eldest one who actually comes across as the youngest one due to my funny streak. Love reading fiction and autobiographies and write religiously everyday. Some of my writings can even be google searched. I only compete with myself, no one else.
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