जागते रहो

यह ब्लाग " जागते रहो " भ्रष्टाचार,अपराध,कानून व्यवस्था और लोकतंत्र के बिगड़े हुए रुप को उजागर करने के लिए एक प्रयास मात्र है। लोग किस तरह इसमें फंसे हुए हैं और एक खास तबका कैसे इसका फायदा उठा रहा हैं। सरकार,राज्य,नागरिक और सत्ता का क्या खेल है और कुछ लोग कैसे खेल रहे हैं। यह ब्लाग इस पर रोशनी डालेगा। यह एक कोशिश है लोगों को जगाने की और उनमें जागरुकता पैदा करने की। इसीलिए इसका नाम "जागते रहो" रखा गया है।

Thursday, December 3, 2020

गाजियाबाद में हिन्दू देवाताओं के अपमान पर कारवाई कब तक?

 

अजय शर्मा 

वरिष्ठ पत्रकार 


अभी कुछ दिन पहले गाजियाबाद के एक लोकल यू टयूब चैनल का वीडियो मुझे देखने के लिए मिला। जिसमें किसी सार्वजनिक शौचालय की बाहरी दीवारों पर भगवान महादेव की तस्वीर की वाॅल पेटिंग की गई है। जिसको लेकर कुछ हिन्दुवादी संगठनों ने अपना विरोध प्रदर्शन भी किया। 

लेकिन इसने मुझे फिर से सोचने पर मजबूर कर दिया कि भारत में क्यों हिन्दू देवी देवताओं का अपमान किया जा रहा है। क्यों सनातन धर्म संस्कृति पर चोट पहुंचाई जा रही है। क्या यह पूर्व सुनियोजित है। क्या इस साजिश में बाॅलीवुड का एक गैंग भी सक्रिय है जो बहुत ही मक्कारी भरी धर्म निरपेक्षता का दिखावा करने वाले कलाकारों से भरा हुआ है। इसी वजह से आए दिन हिंदू देवीताओं पर अभद्र टिप्पणियां की जाती हैं। अभी नवरात्रों के दौरान भी सलमान खान और रणवीर सिंह ने अभद्र टिप्पणी की थी। स्वरा भास्कर भी किसी से कम नहीं है। बाॅलीवुड का सनातन धर्म विरोधी गैंग पूरी तरह से सक्रिय है। अभी हाल ही में नेटफिल्क्स पर रीलीज हुई वेब सीरीज ए सूयटेबल बाॅय में हिन्दू धर्म का अपमान किया गया। ऐसे ढेरों उदाहरण हैं जिसमें हिन्दू धर्म को सबसे ज्यादा गलत दिखाया जाता है। ऐसी फिल्मों की भरमार है। 

आपको याद होगा कि पिछले साल जनवरी 2019 में प्रयागराज कुंभ में कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी का दुर्गा के अवतार वाला विवादित पोस्टर लगाया गया था। इस पोस्टर में लिखा गया था- कांग्रेस की दुर्गा प्रियंका करेंगी शत्रुओं का वध। इससे पहले पटना में कांग्रेस नेताओं ने पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी को राम का अवतार दिखाते हुए पोस्टर लगाए थे। अमेठी में भी राहुल गांधी को राम दिखाते हुए पोस्टर लगाए जा चुके हैं। जाने अंनजाने में इसके जरिए  हिंदू देवी-देवताओं का मजाक बनाया गया। 

कांग्रेस के बड़े नेता और राहुल गांधी के करीबी शशि थरूर ने भी प्रयागराज कुंभ को लेकर हिंदू धर्म का मजाक उड़ाया था। दिल्ली में संगठन सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया द्वारा आयोजित ‘एक शाम बाबरी मस्जिद के नाम’ कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कांग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर ने भगवान राम, अयोध्या स्थित राम जन्मभूमि स्थल सभी को कठघरे में खड़ा कर दिया था। जिसके बाद उन्हें कड़ी आलोचना का शिकार होना पड़ा था। 

सेक्युलर देश में हिन्दुओं की आस्थाओं को निशाना बनाने के लिए इतना उतावलापन क्यों है? इस धर्म निरपेक्ष देश में हर दूसरे मुद्दे पर अक्सर हिन्दू आस्थाओं का अपमान करना क्यों इतना आसान है? कभी हिन्दुओं के त्योहारों का मजाक बनाया जाता है तो कभी त्रिशूल जैसे प्रतीकों का उपहास बनाया जाता है। समाज को तोड़ने के लिए इस तरह के प्रपंच गढ़ने वाले लोग कौन हैं और उन्हें किसने शरण प्रदान की है? यह जांच का विषय है। 

इस तस्वीर में किसी कुत्सित मस्तिष्क के रचनाकार ने भारत देश के संविधान का दुरूपयोग करते हुए हिन्दू देवीताओं का अपमान किया है। निश्चित रूप से यह वाॅल पेंटिग घृणित, उन्मादी मानसिकता की उपज से ज्यादा और कुछ भी नहीं है। क्या धार्मिक प्रतीकों द्वारा अपनी कुंठा की अभिव्यक्ति करने वाले जानते हैं कि भविष्य में समाज को धर्म से ही नैतिकता सीखनी होगी?


मनुस्मृति जलाकर और हिन्दू आस्थाओं को ठेस पहुँचाकर अल्पकालिक रोष व्यक्त करने वाले अक्सर भूल जाते हैं कि वह कोई बड़ा परिवर्तन नहीं ला रहे हैं बल्कि इस अंतराल को और बढ़ा रहे हैं। 

मेरे विचार से यदि किसी भी संगठन अथवा संस्था का दर्शन जानना है, तब उस संस्था और संगठन के अंतर्गत जो क्रांतियाँ आई हैं, उनका आवश्यक रूप से अध्ययन किया जाए। क्रांति दर्शन की जननी है, चाहे उसे दर्शन की जननी न भी माना जाए, फिर भी वह ऐसा दीप है, जो दर्शन को प्रकाशयुक्त बनाता है। धर्म भी इस नियम का अपवाद नहीं हो सकता। इसलिए मेरी दृष्टि से सबसे अच्छा तरीका यही है कि यदि हम किसी धर्म के दर्शन का मूल्यांकन करना चाहते हैं और इसके लिए कोई कसौटी निश्चित करना चाहते हैं, तब उस धर्म में जो क्रांतियाँ आई हैं, उनका अध्ययन करें। यही एक तरीका है। ना कि उसका तिरस्कार करके। 

अपने देश में धर्म निरपेक्षता और विचारों की अभिव्यक्ति के अधिकार को कुत्सित हथियार बनाकर कुछ संगठन सनातन धर्म संस्कृति या फिर मनुवादी संस्कृति के खिलाफ जहरीला विरोध करते दिखाई दे जाते हैं। 


अब गाजियाबाद में शौचालय की दीवार पर भगवान महादेव की तस्वीर की वाॅल पेंटिग यह बताने के लिए काफी हिन्दू देवी देवताओं का अपमान सुनियोजित ढंग से किया जा रहा है। इसकी बहुत गहन जांच पड़ताल की आवश्यकता है। गाजियाबाद के सांसद जनरल वीके सिंह, विधायक अतुल गर्ग और मेयर आशा शर्मा जी इसकी गंभीरता को समझते हुए जांच करवाएं। जिससे गाजियाबाद के लोगों के बीच एक सार्थक संदेश जाए। गाजियाबाद पूछ रहा है हिन्दू देवीताओं के अपमान पर अभी तक कारवाई क्यों नहीं हुई।   

Posted by ajay sharma at 12/03/2020 04:23:00 PM No comments:

Thursday, November 26, 2020

कोरोना ना हुआ शहनशाह हो गया

 

कोरोना ना हुआ शहनशाह हो गया
अजय शर्मा वरिष्ठ पत्रकार

अंधेरी रातों में सुनसान राहों पर हर जुल्म मिटाने एक मसीहा निकलता है जिसे लोग शशाह कहते हैं। यह फिल्म 1988 में आई फिल्म शहनशाह की है। जो बरबस कोरोना को लेकर लगाए गए रात के कर्फु को लेकर इस तरह गुनगुना रहे हैं। अंधेरी रातों में सुनसान राहों पर हर आदमी को मिटाने एक यमराज निकलता है जिसे लोग कोरोना कहते हैं।
कोरोना ना हुआ शशाह हो गया। जो सिर्फ रात को ही निकलता है। जिसके प्रकोप से बचने के लिए रात का कर्फु कुछ शहरों में लगाया गया है।

ऐसे कुछ चुटकुले या फिर हंसी के व्यग्य सोशल मीडिया पर तैर रहे हैं। लेकिन इस कोरेना ने एक बार फिर से नई बहस को जन्म दे दिया है। बहस हो रही है कि लोग लापरवाह हैं या फिर सरकारें। या फिर खुद ही। जिम्मेदारी किसकी है इस आपदा से सामना में। ऐसे में कुछ ज्वलंत सवाल मुंह बयां खड़े हैं।

देश भर में विशेष रूप से दिल्ली, महाराष्ट्र और गुजरात में को विभाजित के मामलों में वृद्धि हो रही है, दिल्ली में विशेष रूप से नवंबर में हालात खराब हो गए हैं। दिल्ली में एक दिन में 6,746 मामले दर्ज किए गए, उसके बाद महाराष्ट्र में 5,753 नए मामले दर्ज किए गए, जबकि केरल में 5,254 दैनिक मामले दर्ज किए गए। वहीं डब्लूएचओओ ने उत्तर प्रदेश सरकार की कोरोना से सामना को लेकर प्रशंसा की है।

डॉक्टरों को डर था कि दिल्ली अच्छी तरह से भारत के शीतकालीन संक्रमण की पहली लहर का केंद्र बन सकती है और वही हुआ है।
नवंबर की शुरुआत से अब तक राजधानी में 128,000 से अधिक मामले जुड़े हुए हैं। 12 नवंबर को इसने 8,593 मामले दर्ज किए, एक दिन में सबसे अधिक प्रकोप शुरू हुआ। दिल्ली अब किसी भी राज्य की तुलना में अधिक मामलों को दर्ज कर रही है। इसकी कुल केस संख्या 500,000 से अधिक है। पिछले कुछ दिनों से स्थिति और भी गंभीर होती जा रही है
अभी कुछ दिन पहले दिवाली के बाद मौसम तेजी से बदला और स्माग ने पूरे देश को ढक लिया तो केंद्र सरकार ने हरियाणा, राजस्थान, राजस्थान, और मणिपुर के जिलों में उच्च स्तरीय टीमों को दौड़ाया, जो साइवी -19 मामलों की उच्च संख्या की रिपोर्ट कर रहे थे। इन टीमों को सकारात्मक मामलों की रोकथाम, निगरानी, ​​परीक्षण और अनुकूल नैदानिक ​​प्रबंधन को मजबूत करने की दिशा में प्रयासों का समर्थन करने के लिए भेजा गया था।

मध्य प्रदेश सरकार ने इंदौर, भोपाल, ग्वालियर, रतलाम और विदिशा जैसे पांच शहरों में कर्फ्यू 10 बजे से सुबह 6 बजे तक लगाया। गुजरात सरकार ने सूरत, वडोदरा और राजकोट शहरों में रात का कर्फ्यू लगाने का फैसला किया। राजस्थान, उत्तर प्रदेश, पं। बंगाल सहित पूरे देश में कोरोना का संक्रमण चरम पर है। यदि आप देश के नक्शे को देखते हैं तो वह पूरा नक्शा को विभाजित की मौजूदगी से भरा हुआ है।

कोरोना के संक्रमण और रोगियों में बेतहाशा वृद्धि की कारण कोशिकाओं, और कोशिकाओं के खुलने से वृद्धि हुई है, और एक व्यस्त त्यौहार के मौसम में सामाजिक मेलजोल में वृद्धि हुई है। गिरते तापमान और बढ़ते वायु प्रदूषण से भी इसका प्रकोप हुआ है। रोगी इस समय समूहों में आ रहे हैं। त्योहारों और लगातार और बार-बार इनडोर चेकोन्स में भाग लेने के बाद परिवारों और दोस्तों को चेतन और वायरस से पीड़ित हो रहे हैं।

आपको जानकर हैरानी होगी कि डॉ। इस समय युवा रोगियों की संख्या में वृद्धि की रिपोर्ट कर रहे हैं। डॉक्टरों का कहना है कि गर्मियों की तुलना में अधिक कम घातक परिणाम हो लेकिन चिंता है कि कई रोगियों की, जो बीमारी से उबर चुके हैं, जल्द ही कोविड की चपेट में आ जाएंगे। श्वास, मस्तिष्क, हृदय और हृदय प्रणाली से सब कुछ प्रभावित होगा। नमकीन, आंत, यकृत और त्वचा। इस तरह की स्थिति से निपटने के लिए बहुत सावधानी की जरूरत है। गंभीर रूप से बीमार रोगियों में से कुछ 70 प्रतिशत 55 वर्ष से ऊपर हैं, लेकिन बहुत सारे रोगी 25 से 45 वर्ष के बीच हैं।

 दोस्तों युवा महसूस करते हैं कि वे अजेय हैं और वे बाहर जा रहे हैं और मिल रहे हैं। मेरा मानना ​​है कि इन युवा वयस्कों में से कई कट्टरपंथी सुपर-स्प्रेडर हैं।

ऐसी बहस फिर वही कि कोरोना को फैलाने देने के लिए जिम्मेदार कौन है। इसके लिए साझा प्रयास होना चाहिए। इसे सत्ता पक्ष और विपक्ष की राजनीति का मुददा नहीं बनना चाहिए। कोरोना से बचाव के लिए सार्थक प्रयास होने चाहिए। इसमें सभी देशवासियों की सहभागिता अनिवार्य है। इससे सामना करने के लिए रात का कर्फु पर्याप्त नहीं है। अन्यथा लोग ऐसे ही गुनगुनाएंगे गाते हैं कि कोरोना ना हुआ शशाह हो गया है। इसलिए तत्काल प्रभाव से कठोर कदम उठाने की आवश्यकता है। साथ ही डब्लूएचओओ ने जो प्रशंसा उत्तर प्रदेश सरकार की है उसे यथा बनाए रखना है। हमें दिल्ली और हरियाणा से लगे शहरों को लेकर ठोस रणनीति की आवश्यकता है।  

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Posted by ajay sharma at 11/26/2020 04:14:00 PM No comments:

तेंदुआ कहीं पालतू तो नहीं था?


वरिष्ठ पत्रकार अजय शर्मा की कलम से 

गाजियाबाद में एक तेदुंए के देखने जाने की खबर ने मीडिया में सुर्खियां बटोरी। इस खुनूखर जानवर ने जीडीए वीसी कंचन वर्मा के गार्ड को भी 

घायल हो गया। और उसके बाद शहर भ्रमण पर निकल गया। उसके शहर के भ्रमण को रोकने के लिए वन विभाग की टीम शहर के चप्पे चप्पे पर तैनात हो गई है। लेकिन वह सिर्फ शहर में तैनात सीसीटी कैमरों को जिसकी फुटेज सोशल मीडिया पर अपलोड कर दी गई। 

लेकिन यह तेदुंआ यानि कि लेपर्ड कुछ सवाल खडे कर रहा है। जिनके उत्तर गाजियाबाद की मांग है। यह गाजियाबाद शहर के राजनगर कालोनी कैसे पहुंचा। क्योंकि गाजियाबाद से लगे हुए ऐसे जंगल कौन से हैं जहां पर जंगली जानवर रहते हैं। पिछले एक साल में इन जंगलों में या फिर सीमावर्ती इलाकों में तेदूए जैसे जानवर देखे गए हैं। 

इस जानवर के निशान सिर्फ राजनगर में ही क्यों है। सबसे बड़ी बात यह तेदूआ हिंट दिखाई नहीं पड़ रही है। उसने गार्ड पर हमला तो किया लेकिन अपने प्राकृतिक स्वाभाव के विपरीत जख्मी करके छोड़ दिया। ऐसा क्यों। कहीं यह तेदुंआ किसी का पालतू तो नहीं था। इसकी जांच पड़ताल की आवश्यकता है। क्योंकि साहब शौक बड़ी चीज है। लोग कुत्ते बिल्ली के अलावा जंगली जानवर पालने की भी इच्छा रखते हैं। लेकिन यह इच्छा इंसानी जीवन के लिए खतरा होता है इसलिए ऐसे जानवरों के साथ फोटो खिंचवाकर सोशल मल्टीमीडिया पर अपलोड कर दिए जाते हैं। इसलिए साहब ने कहा कि शौक बड़ी बात है। 

ऐसे में शुद्धता के साथ तेदूए की मौजूदगी की जांच पड़ताल की आवश्यकता है। आज तक हिन्दू शहर के भ्रमण के लिए निकला है। हो सकता है कल को शेर, लोमड़ी, हाथी, टाइगर, अजगर या फिर कोबरा भी शहर भ्रमण के लिए आते हैं। अत यह जांच का विषय है, तेदूओं के रूप में जंगली जानवर शहर भ्रमण के लिए कैसे आया। 

 ऐसा नंदू के गाजियाबाद के शहरी क्षेत्र मेें आने वाला यह पहली घटना हो। अगस्त के महीने में भी साहिबाबाद के वैशाली में तेदुआ देखे जाने की खबर आई थी तब तक भी रेस्क्यू टीम और वन विभाग की टीम को कोई सुराग नहीं मिला था। दो महीने बाद फिर तेदुआ राजनगर कालोनी में घूमता हुआ दिखाई दिया। इस बार भी वन विभाग खाली हाथ है। इस नाकामी ने लोगों की जिदंगी को खतरे में डाल दिया है।

डीएफओ दीक्षा भंडारी के मीडिया को बताए गए आश्वासन में सिर्फ हताशा ही समझ में आती है। क्योंकि वे पिछली बार की ही तरह इस बार भी लेपर्ड के निशान नहीं मिले हैं। लेकिन उन्हें नए सिरे से सोचना होगा और जांच शुरू होनी चाहिए। लोगों की संभावनाओं के आधार पर कि वह देहरादून से किसी टक में यहां पहुंच जाएगी या फिर हरनंदी नदी के किनारे यहां तक ​​आ गई। " काम नहीं चलेगा। यह लोगों की जिदंगी का सवाल है।  


तंेदुआ का आसान शिकार बच्चे होते हैं। तंेदुआ कुत्तों का भी शिकार करना पसंद करता है। लेकिन अभी तक ऐसी कोई भी घटना सामने नहीं आई है। लेकिन दहशत के बादल गाजियाबाद, दिल्ली, नोएडा, मेरठ में छाए हुए हैं। 

दो हफते पहले ही बरेली में तेंदुआ देखने के लिए मिला था जिसके बाद कुछ बच्चे बीमार पड़ गए थे। आपको याद होगा कि सन 2019 -20 में जयपुर, जबलपुर, पीलीभीत, ग्वालियर, नागपुर, हैदराबाद में भी तेदुए की खबरें थीं लेकिन ये वो क्षेत्र थे जो जंगल के करीब थे।


इसलिए अपनी जिदंगी की सुरक्षा के लिए हम सभी को खोजने के लिए रहना होगा। पुलिस और रेस्क्यू टीम के फोन नं अपने पास इमरजेंसी मोड में रखने होंगे।

प्रशासन को भी चैकन्ना और उपस्थिति मोड में रहने की आवश्यकता है। कहीं ऐसा ना हो यह तेदुआ कुद लोगों को अपना शिकार बनाने ले। पिछली बार की तरह नहीं होना चाहिए कि वह तेदुआ जो बिग फैट कैट समझ में आ रहा था और नजरअंदाज कर दिया गया था। महज उसके दो महीने बाद ही गाजियाबाद के शहरी क्षेत्र में तेदुआ घूमता हुआ दिखाई दिया। जिन्होंने जीडीए के सफाईकर्मी पर भी हमला कर दिया। इसलिए लोगों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए इस लेपर्ड का पकड़ा जाना बहुत जरूरी है। अगर यह लेपर्ड आदमखोर हो गया तो बहुत सी जिदंगियों की बलि चढ़ जाएगी। मुस्तैदी के साथ उसे ढूंढा जाना अनिवार्य है और साथ ही यह लेपर्ड यहां कैसे और कहां से पहुंचा। इन सवालों के जवाब गाजियाबाद पूछने वाला है। 

Posted by ajay sharma at 11/26/2020 04:10:00 PM No comments:

Wednesday, November 25, 2020

मत भूलो यह कोरोना महामारी है

 अजय शर्मा वरिष्ठ पत्रकार  


गाजियाबाद पुलिस ने कोरोनान्वेशन को लेकर एक संदेश जारी किया कि अगर आपने घर से बाहर निकलते वक्त फ़ंक्शन नहीं लगाया तो आपको और 10 घंटे की असथाई जेल की सजा हो सकती है। साथ ही शादी के मौसम में सामाजिक भागीदारी के लिए लोगों की संख्या 50 कर दी गई है। आज देवठान है और मेरी सुयासटी में सुबह से बैंड बाजे वाले किसी घर में विवाह आयोजन के लिए बैंड बजा रहे हैं।


कोरोना महामारी के समय में विवाह के मौसम में शासन प्रशासन की व्यवस्था की अग्निपरीक्षा है। क्योंकि जरा सी भी लापरवाही कोरोना को दावत देना जैसी है। कोरोना की कालिख गहरी होती रही है। ये सिर्फ महामारी भर नहीं रह गई है। इसने समाज, सरकार, सरोकार और इंसानी संवेदनाओं पर अपना घातक पंजा जमा दिया है। यह समय मानवता के एक होने का था पर हो सकता है।


हमने पिछले कुछ महीनों में देखा है कि तमाम फर्जी ऑड-वीडियो और सोशल मीडिया के अदृश्य कीमियागीरों की हरकतों का कमाल रहा है कि देश की बड़ी आबादी के जेहन में कोरोना को लेकर भ्रांतियां भर गई हैं। ऐसे लोगों कों यह भी नहीं बिसराना चाहिए कि आज नहीं, तो कल महामारी अपने हिस्से की बलि लेकर चली जाएगी पर यह बेवकूफी और लापरवाही का विष समाज को तोड़-मरोड़कर रख देगा। मुझे इन दिनों अक्सर अल्वेयर कामू का प्लेग याद आता है। उपन्यास में ओरॉन नाम के शहर में प्लेग की वजह से नाकाबंदी हो गई थी और उसके बाद चर्च का पादरी जो कह रहा था, उसके साथ जो स्थिति बनी उसने वहां की तस्वीर इतनी भवावह बनाई उसे बयां करना मुश्किल है।

कोरोना की वजह से हमने पिछले कुछ महीनों में स्थितियों के प्रति पनप रहे अविश्वास को भी देखा है। भारत के अलग-अलग राज्यों की सरकारों के रूख ने जो तस्वीर दिखाई वो लोगों में गुस्सा और नाराजगी भरी। अमेरिका और यूरोप के तमाम देशों में सरकारों पर भी सवालिया निशान खड़े हुए। इटली, स्पेन और ब्रिटेन में रोगियों और मौतों की संख्या हर रोज अपना ही रिकॉर्ड तोड़ रही थी। ऐसे में कोरोनातीत ब्रिटिश प्रधानमंत्री की हर ओर थू-थू तो हो रही थी के साथ ही सरकार की कार्यशैली पर भी सवाल उठ रहे थे। अमेरिका से लेकर रूस तक सभी के हालात खराब थे। और हम अपने देश भारत में कोरोना को लेकर लापरवाही बरत रहे थे और आज भी वही स्थिति है। यकीनन पूरी दुनिया में सरकारों की विश्वसनीयता खतरे में पड़ गई है। अगर यह दौर लम्बा खिंचा तो यह धरती अराजकता की ओर बढ़ती दिखाई पड़ती है। भारत में लॉकडाउन को दोष से लागू करवाया गया और अब फिर से लाकडाउन की चर्चा हो रही है। 


संकट अगर पूरीची धरती का है, तो इसके वाशिंदों को एक तो होना पड़ेगा। कोविद -19 ने अपने पांव सरहनों को बिना पहचाने पसारे हैं। इससे लड़ाई भी ऐसे ही लड़नी होगी पर यह नामुमकिन है। अमेरिका का उदाहरण लैन। अब तक यह महादेश ऐसी आपदाओं के वक्त में एक क्लस्टर महाजन की तरह इमदाद मुहैया करा देता था। मैंने उसके लिए इस विशेषण का इसलिए उपयोग किया, क्योंकि किसी खुर्रान्त सूदखोर की भांति अमेरिका ने हमेशा अपनी इमदाद की बड़ी कीमत वसूल की है। इस समय पृथ्वी का स्वर्ग स्वयं नर्क में तब्दील हो गया है। 


अमेरिका और यूरोप के बाद शंकाएं, आशंकाएं और अधीरताएं पूरीची दुनिया में फैली हैं। सवाल उठता है कि जब धनी-मानी देश इसके सामने-विवश नजर आ रहे हैं, तो गरीब मुल्कों का क्या होगा? अमेरिका के डॉ और नर्स साधनहीनता की दुहाई दे रहे थे। रही बात भारत की तो हमारे तमाम अस्पताल तो प्राथमिक सुविधाओं तक से लैस नहीं हैं। बातें हम भले ही बहुत बड़े करते हों, पर सच यह है कि पहाड़ी, समुद्री और रिवानी क्षेत्रों के बहुत से गांवों में आज भी अगर कोई युवती गर्भवती होती है, तो उसे सलाह दी जाती है कि अपने मायके हो आओ, कहीं पीड़ित के दौरान। कुछ न हो जाए? आपको यह बताता है कि मेरे दिमाग में एक तस्वीर कौंध रही है। अप्रैल के महीने में मैंने मीडिया में कश्मीर के दुर्गम इलाके की फोटो देखी थी। कई लोग एक जुगाड़ की स्ट्रेचर पर गर्भवती महिला को टांगे ले जा रहे थे। चिकित्सा और स्वास्थ्य के मामले में हम आदिम युग में जी रहे हैं।


क्या आप भूल गए हैं कि कुछ महीने पहले तमाम राज्यों से ऐसी रिपोर्ट आईं जिसमें बताया गया था कि कोरोना मरीज का इलाज करने वाले चिकित्सा कर्मियों के पास जरूरी ड्रेस ही उपलब्ध नहीं हैं। यह तो दूर-की की बात थी, देश की राजधानी दिल्ली के बेहतरीन गंगाराम अस्पताल के दर्जनों चिकित्सा कर्मियों को क्वारंटीन कर दिया गया था। यदि कोई परिस्थिति बिगड़े, तो चिकित्सा कर्मियों के लिए खतरा और बढ़ेगा। 


यह हमारी स्थायी हतभागिता है की ऐन जंग के समय हमें मालूम पड़ता है कि हमारे युवा शेयर डिस्काउंट-ओ-सामानों को नहीं चला रहे हैं। अमेरिका और यूरोप में निजी अस्पताल इस महामारी से लड़ने में अपनी सरकारों की मदद कर रहे हैं। इसलिए मौजूदा समय में भारत में बड़े अस्पताल श्रृंखलाओं को इस मामले में खुल कर सामने आना चाहिए। गिने-चुने निजी अस्पताल हैं, जो इसका इलाज कर रहे हैं। सरकारी और निजी स्वास्थ्य सेवाओं के बीच तालमेल अगर नहीं बढ़ा, तो आने वाले दिनों में कठिनाई हो सकती है।


देश को चाहिए कि वह ऐसे मुद्दों पर विचार कर इनका हल जल्दी से खोजे कि आखिर हम कर क्या रहे हैं? इसकी उलट सारी बहस लव जिहाद कानून, एमएलसी चुनाव, जम्मू कश्मीर के जिला विकास परिषद चुनाव और बंगाल चुनाव पर केंद्रित हो गई है। हम पर और मुद्दों पर भी ध्यान देना होगा। अब तक जितने मरीज सामने आए हैं, वो शेरपाही का ही नतीजा है। इस ढिलाई का एक ही प्रायोजन है कि चिकित्सा सुविधाओं को जल्दी इस लायक बना लिया जाए कि वे संकट की स्थिति में आम आदमी की जीवन रक्षा कर सकें।


आज दिल्ली के साथ साथ पूरे देश में एक सिरहन लोगों के दिलों में बैठ गया है कि अगर उनके घर में कोई बीमार है, तो उसका क्या होगा? कहीं परिवार का एक और सदस्य तो उसकी चपेट में नहीं आ जाएगा? क्या पता कब इट्स हमें भी चपेट में ले ले?

ऐसे में प्रभावी व्यवस्था बनाना चुनौती का काम है। ऐसा नहीं हैं कि सरकारें सो रही हैं। केंद्र सरकार ने उस समय में लॉकडाउन कर दिया था, जब अधिकांश देश इसके बारे में सोच ही रहे थे। जिन्होंने देरी की, वे इसका दुष्परिणाम भुगत रहे हैं। जर्मनी ने कोरोना पीड़ितों के मामले में चीन को पीछे छोड़ दिया था। भारत में ऐसे भी मुख्यमंत्री हैं जिन्होंने कोरोना से आम जनमानस को बचाने के लिए दिन रात एक कर दिया है। 


हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि आपदा से लड़ने का सबसे बढ़िया तरीका आपसी सहयोग और निर्भरता है। हिन्दुस्तानियों को यह कायम रखना होगा यह कैसे होगा? हम तो गैरजरूरी मुद्दोंदो में सिर खपाए बैठे हैं।


Posted by ajay sharma at 11/25/2020 12:54:00 PM No comments:

Monday, November 23, 2020

कोरोना अभी जिंदा है

अजय शर्मा की कलम से 


आज एक बार फिर से मुझे कहना पड़ रहा है कि कोरोना अभी जिंदा है। दिल्ली से आने वाले मौत और संक्रमित लोगों के आंकडें़ बताने के लिए काफी हैं कि हालात भयानक होने वाले हैं। यूरोपियन देशों के हालात तो पहले से ही बदतर हैं। 

काॅलर टियून में अमिताभ बच्चन की चेतावानी देती आवाज लोगों को कितना जागरूक कर पा रही है। यह बहस का विषय हो सकती है लेकिन राज्य सरकारों ने लोगों को कोरोना के दलदल में फंसाने वाला काम ही किया है। जानकारों ने पहले से ही चेताया था, डाॅक्टर्स ने भी बताया था कि सर्दियों में कोरोना जमकर कहर बरपायेगा। जैसे ही पारा नीचे जाएगा। संक्रमण का खतरा और बढ़ जाएगा। सर्दी, खांसी, नजला, बुखार लोगों को होंगे। मौसम जब बदलाव करता है तो इस तरह की बीमारियों की संभावनाएं तेज होती हैं। ये बीमारियां कोरोना को न्यौता देती हैं, दावत देती हैं। और अब वही हो रहा है। कोरोना का संक्रमण फिर से मुंह आने लगा है। कोरोना का आंकड़ा बढ़ रहा है। लेकिन हमने कुछ नहीं किया। हमने यानि हम और सभी राज्य सरकारें। हम आंखें बद करके बैठे हुए थे। हम शुतुरमुर्ग की तरह अपनी गर्दन जमीन में गाड़ ली कि सब अच्छा है। कुछ नहीं होगा। सब वहम है। बाजार खुले हुए थे। त्यौहारों को मौसम था। जबरदस्त भीड़ देखने को मिली। देश की राजधानी दिल्ली से लेकर नोएडा, गाजियाबाद, आगरा, मुरादाबाद, बरेली, लखनउ, चंडीगढ़, देहरादून, जयपुर, कोलकाता, मुंबई, पटना, अहमदाबाद, बंगलुरू तक कोई शहर नहीं बचा। लोग सड़कों पर और बाजारों में। देह दूरी की धज्जियां उड़ाई जा रही थी। कोई भी मास्क लगाने के लिए तैयार नहीं। लोग खतरों के खिलाड़ी बने हुए। लापरवाह, गैर जिम्मेदार लोग। हमने यह सब होने दिया। 

मैं आपको याद दिला दूं कि हमने घरबंदी भी स्वीकार की यानि कि लाॅकडाउन। हमने थाली ताली भी बजाई। हमने कोरोना वाॅरियर को सम्मानित भी किया। और अब कोरोना के संक्रमण का आंकड़ा 91 लाख को छू रहा है तो लोग कह रहें हैं कि यह तो होना ही था। इसके लिए सरकारें जिम्मेदार हैं।

लेकिन इस वक्त सबसे ज्यादा चर्चा देश के दिल दिल्ली की हो रही है। दिल्ली में केस बढ़ रहे हैं। दिल्ली सरकार और गृह मंत्रालय के बीच बैठक भी हो चुकी है। अलग अलग राज्यों में टीमें भी भेजी जा चुकी हैं। और अब तो दिल्ली बार्डर पर कोरोना की टेस्टिंग भी शुरू हो चुकी है। शादी विवाह जैसे सामाजिक आयोजन में लोगों की संख्या 200 से घटकर 50 तक हो गई है। यहां तक कि राजस्थान में रात का कफर््यू तक लगाया जा चुका है। दिल्ली में मास्क ना लगाने पर जुर्माना 2000 रूपए तक हो चुका है। 

आपके लिए मेरी यह चेतावनी है कि कोरोना शहर के साथ साथ गांव में भी फैल रहा है। हिमाचल का एक पूरा गांव शादी के आयोजन के बाद कोरोना से संक्रमित हो गया सिर्फ एक व्यक्ति बचा। यह सभी के लिए खतरे का अलार्म है गांव से लेकर शहर तक कोरोना संक्रमण तेजी से फैल रहा है। 

आज दिल्ली में मरने वालों की संख्या हर घंटे 4 लोगों की है। जिन लोगों ने इस बीमारी की वजह से अपनों को खोया है उनके दर्द को समझा जा सकता है। शमशान घाट पर अंतिम संस्कार के लिए भी लंबी लंबी लाइनें देखी जा सकती हैं। घंटों तक पीपीई किट में खड़े लोगों के आंसुओं को कोरोना सुखाए दे रहा है। दोस्त, पड़ोसी और रिश्तेदार अंतिम संस्कार के वक्त मौजूद नहीं है। कब्रिस्तानों में जगह खाली नहीं है और हम हैं कि मानते नहीं हैं। कोरोना इतनी तेजी से चपेट में ले रहा है कि संभलने का मौका तक नहीं मिल रहा है। अस्पतालों के हालात ऐसे हो चुके हैं कि दूसरी बीमारियों के मरीजों को इलाज मिलने में मुश्किल हो रही है।  

मौजूदा हालातों ने एक बात तो साबित की है कि कोरोना जागरूकता पर खर्च किया जाने वाला पैसा बर्बादी ही है। इसलिए सरकार को मास्क ना लगाने पर जुर्माने का रास्ता अपनाना पड़ा। आपको जानकर हैरानी होगी कि दिल्ली पुलिस ने अब तक 24 करोड़ से ज्यादा लोगों से जुर्माना वसूल लिया है लेकिन हम है कि मानते ही नहीं है।

आपदाएं, महामारियां आदम और हव्वा की संतानों का नसीब रही हैं, पर ये महा-बदनसीबी के दिन हैं। कोविड-19 ने धरती को अभूतपूर्व संकट में    झोंक दिया है। कोविड ने डब्ल्यू एच ओ पर भी सवालिया निशान लगा दिए हैं। इसके अस्तित्व और कार्य प्रणाली पर नये सिरे से बहस चल रही है। आखिर क्यों यह संस्था समय रहते इससे निपटने के कारगर उपाय नहीं ढूंढ पाई। क्यों यह समय से सटीक चेतावनी और गाइडलाइंस जारी नहीं कर पाई। 

दुनिया के लिए ये हालात दुखद हैं, क्योंकि इस संगठन ने अतीत में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है। स्मॉलपॉक्स के उन्मूलन और पोलियो पर सार्थक लगाम लगाने के मामले में डब्ल्यूएचओ की भूमिका बहुत बड़ी है। हमें ऐसी संस्थाओं की जरूरत है।

आइए आपको थोड़ा से कारोना के अतीत में लेकर चलता हूं कि इसी साल मार्च अप्रैल में लाॅकडाउन के वक्त क्या हालात थे। लॉकडाउन शुरू होने के बाद से लेकर अब तक की सबसे भयावह जो तस्वीर है, वो है मजदूरों के पलायन की और शमशान घाट की। ये मजदूर चले जा रहे थे, बस चले जा रहे थे, ट्रेनों के नीचे कट रहे थे, सड़कों पर हादसों का शिकार हुए जा रहे थे, भूख से तड़प रहे थे कभी प्यास से बिलख रहे थे. असल में इनकी सुध लेने वाला कोई नहीं था। और अब शमशान घाटों पर लंबी लंबी लाइनें हैं अंतिम संस्कारों के लिए।   


इसलिए आपको सोचना होगा, समझना होगा कि इस महामारी से बचने के लिए सर्तकता और बचाव ही उपाय है। वरना परिणाम आपके साथ साथ आपका यह समाज भी भुगतेगा। यह लड़ाई इंसानी सभ्यता को बचाने की है क्योंकि कोरोना अभी जिंदा है। 

   


  

Posted by ajay sharma at 11/23/2020 01:17:00 PM No comments:
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Ajay Sharma (Ex.Sr. Sub Editor, Hindustan) I am a New Delhi-based journalist,creative writer and blogger in India. Journalism is my passion and I can never think of doing anything else in my life. I am the first generation journalist in my family and have practically devoted the best years of my life to this passion. I am born at Agra and brought up in Moradabad and Delhi-NCR. I live with my family in Ghaziabad which includes my parents. I am the eldest one who actually comes across as the youngest one due to my funny streak. Love reading fiction and autobiographies and write religiously everyday. Some of my writings can even be google searched. I only compete with myself, no one else.
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