अभी कुछ दिन पहले दिल्ली के एम्स अस्पताल जाने का मौका मिला और दिल्ली की सरकारी बस में सवारी करने का मौका मिला। काफी सालों बाद बस के द्वारा सफर करने का चांस मिला लेकिन रास्ते में ट्रैफ़िक जाम मिला तो एक घंटे का रास्ता 3 घंटे में तय हुआ. इस दिन जिंदगी के दो तजुर्बे हुए। मैंने आम आदमी को इलाज की जद्दोहद में अफरा तफरी के माहौल में देखा। डॉक्टर का मरीजों के साथ बहुत ही बेरुखा व्यवहार देखा।
मैं लगभग दो घंटे वहां रहा लेकिन ये दो घंटे बेहद कष्टपूर्ण थे। भीड़,गंदगी और बदबू से वहां खड़े होना मुश्किल हो गया था। बीमारियों से लड़ने की दौड़ में किस तरह गरीब आदमी असहाय है। एम्स का कर्मचारी यहां तक कि डॉक्टर तक मरीजों और आगुन्तकों के साथ व्यवहार कुशल नहीं हैं। मन अंदर तक टीस से भर गया।
एम्स से बाहर निकला और बस स्टैण्ड की और बढ़ा। चारों तरफ सिर्फ भीड़ और गंदगी। इसी सब के बीच भागता हि़न्दुस्तान का आम आदमी। बड़ी मुश्किल से एक बस मिली और उसके बाद मिला दिल्ली की सड़कों पर जाम।
जाम के दौरान कुछ और करने को था नहीं इसलिए दिमाग़ के घोड़े दौड़ने लगे - आसपास के माहौल, राजनीतिक स्थिति और लोगों के बीच जिन बातों की चर्चा हो रही थी, उन्हीं विषयों पर..
ख़बर गरम थी कि झारखंड में निर्दलीय विधायक मधु कोड़ा के पास से मिला अरबों रुपया। दिल्ली में होने वाले कॉमनवेल्थ गेम्स की तैयारियां। मधु कोड़ा पर एक गर्मा-गरम बहस वहां चल रही थी। सभी की अपनी-अपनी राय। लेकिन एक राय मधु कोड़ा के बारे में निकलकर सामने आई कि इसमें होने वाला कुछ भी नही है। मधु कोड़ा के बयानों पर भी अलग-अलग राय। आम आदमी की राय में मधु अब बड़ा नेता बन गया है। कुछ दिनों बाद उसके दखल से ही झारखंड में सरकार बनेगी।
वहीं कुछ लोग कॉमनवेल्थ गेम्स के कारण होने वाली परेशानियों पर चर्चा कर रहे थे। दिल्ली का आदमी आज भी जाम की समस्या से जूझ रहा है। हर जगह सिर्फ जाम और जाम। पिछले कई सालों में काफी पुल दिल्ली में बने हैं। ट्रैफिक को स्मूथ और स्ग्निल फ्री बनाने की कवायद चल रही है। लेकिन स्थिति वहीं की वहीं हैं। जाम से निकलकर बात मंहगाई पर पहुंच गई। मंहगाई पर आम आदमी कितनी उग्र बहस कर सकता है यह सब मैं होते हुए देख रहा था।
मैं उस जाम के दौरान यही सोचता रहा कि जिन लोगों को खाने के लाले पड़े रहते हैं, जिनके स्वास्थ्य की कोई क़ीमत नहीं, जिनके बच्चों को शिक्षा मिलना अब भी एक ख़्बाव बना हुआ है, उन्हें अरबों रुपए की लागत से बनने वाले खेल गांव और गेम्स किस तरह और कितना फ़ायदा पहुँचाएंगे?
एक सवाल ये भी कौंधा कि अगर आम लोगों को ये गेम्स देखने जाना भी हो तो क्या वे जाम से फ्री रोड पर चल सकेंगे। उन्हें हेलीकॉप्टर तो मिलेगा नही? वो जाएंगे तो सड़क के ज़रिए ही लेकिन अगर 1 घंटे का रास्ता 3 घंटे में तय होगा तो उनका पेट कैसे भरेगा. इस सवाल का जवाब तो शीला दीक्षित ही दे सकती हैं। बहरहाल, बस में बैठे लोग बेहाल थे, किसी की ख़ुद की तबीयत ख़राब हो रही थी तो किसी को दवाई लेकर जल्दी घर पहुंचना था.
किसी बच्चे की किलकारी और चीख़ से मेरा ध्यान टूटता लेकिन बस में सिर्फ़ सोचते रहने के सिवाय मेरे पास कोई चारा नहीं था. मैं सोचने
लगा कि शेरशाह सूरी ने सदियों पहले जब हज़ारों मील लंबा ग्रांट ट्रंक रोड बनवाया था तो उसने भी यह सपने में नही सोचा होगा कि यह सड़क भविष्य में कितनी दुखदायी हो जाएगी लोगों के लिए।
मैंने उस जाम में इस पॉजीटिव उम्मीद के साथ बाबा रामदेव ध्यानयोग करने की कोशिश की कि हो सकता है इससे सड़कों और लोगों की हालत अच्छी होने में कुछ मदद मिल सके। बहुत से अन्य लोगों की ही तरह मैं भी उस दिन के इंतज़ार में हूँ जब कोई काला बंदर या स्पाइडरमैन आकर कोई करिश्मा करेगा क्योंकि आम लोगों ने तो अब पुलिस, प्रशासन और राजनेताओं पर छोड़ने की बजाय किस्मत पर छोड़ दिया है। और कहता है कि देखते हैं क्या होता है। हमें तो ऐसे ही जीना है। हमें तो ऐसे ही काम करना है और जिंदगी जीने के लिए पैसा कमाना है। चीखने चिल्लाने से कुछ नहीं होने वाला है। बस जिंदगी यूं ही चलती जाएंगी।
Wednesday, November 18, 2009
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