कुछ दिन पहले एक खबर गाजियाबाद से आई कि बहन और बहनोई के आपसी विवाद को सुलझाने की कोशिश में दोनों पक्षों में मारपीट हुई। नतीजा स्वरुप एक युवक को कुछ ज्यादा ही चोटें आई।
उसे अस्पताल ले जाया गया, उपचार चला, थाने में केस दर्ज किया गया। कुछ लोगों के खिलाफ नामजद एफआईआर लिखवाई गई। मारपीट में घायल युवक की दुबारा तबीयत बिगड़ जाती है और उसे नजदीकी अस्पताल में एडमिट करा दिया जाता है। वहां वह युवक दम तोड़ देता है।
इसके बाद पुलिस कुछ लोगों को हिरासत में लेती है पूछताछ के लिए। अब यहां से शुरु होती है पुलिसिया कार्यवाई। पुलिस ने अपने चिरपरिचित अंदाज में कार्रवाई शुरु की। जैसा कि होता है मुख्य अभियुक्त घटना के बाद फरार हो जाता है। पुलिस उस शख्स को गिरफ्तार करने के लिए कुछ लोगों को हिरासत में ले लेती है पूछताछ के लिए।
और उन लोगों को मानसिक रुप से पीडि़त करती है। परेशान व्यक्ति अपने आप को वहां निकालने के लिए कोशिशें आरंभ करता है। वह अपने मिलने जुलने वालों से कहता है कि वे लोग उसकी मद्द करें। और फिर शुरु होता है मद्द लेने के लिए लोगों से प्रयासों का सिलसिला।
मैंने अपने कैरियर में ऐसे बहुत सारे मामले देखे और पुलिसिया कार्रवाई को नजदीकी से स्टडी किया। पुलिस किस तरह से कार्य करती है। उसकी बेशर्मी, ढिठाई, उसका निरंकुश होना, केस को तोड़ना-मरोड़ना जैसे क्रियाकलापों को नजदीकी तौर देखा है।
जिस व्यक्ति का मैं जिक्र करने जा रहा हूं इन सज्जन का मेरे पास भी फोन आता है मद्द के लिए। इनका कसूर सिर्फ इतना था कि फरार व्यक्ति इन साहब के यहां बतौर किरायेदार रहता था। और इन साहब ने किरायेदार का पुलिस के यहां वेरीफिकेशन नहीं करया था।
यह साहब साहिबाबाद के शालीमार गार्डन में प्रापर्टी का व्यवसाय करते हैं और कुछ किरायेदार इनके यहां किरायेदार बतौर रहा करते हैं। इन सज्जन का नाम शालीमार गार्डन में काफी चर्चित है ये हैं बुद्ध देव गौड।
बुद्ध देव को सुबह से शाम तक बैठा कर रखा जाता है। मानसिक रुप से प्रताडि़त गौड़ छुटकारा पाने के लिए पुलिस को पैसे का लालच देता है और वह कामयाब हो जाता है। आजादी की कीमत 2 लाख से शुरु होकर 50000 पर रुक जाती है। इस काम को अंजाम देता है एक सफेद पोश कांग्रेसी नेता नरेंन्द्र राठी। महाशय छूटकर आजाते हैं।
तो यह है हमारी गाजियाबाद पुलिस
मैंने जब इंस्पेक्टर से पूछा था कि क्या मामला है। तो थानेदार साहब ने कहा था कि मृतक ने मरने से पहले उनका नाम लिया था इसलिए उन्हें पूछताछ के लिए रोका गया है। मैंने कहा कि यदि वह दोषी हैं तो उचित कार्रवाई की जाए और यदि निर्दोष हैं तो बेवजह परेशान न किया जाए।
थानेदार साहब ने आश्वासन देकर बात खत्म कर दी।
सुबह मुझे पता चलता है कि वह 50000 रुपेए देकर आजादी की हवा में सांस ले पा रहे हैं। वह बोले हमने गलती सिर्फ इतनी की थी कि किरायोदारों का सत्यापन नही कराया था।
तो जनाब पुलिस ने उन्हें रिहा कर दिया कुछ रुपयों की वसूली करके।
क्या कहें ऐसी पुलिस के बारे में जिसके हाथों में हमारी सुरक्षा का दायित्व है। मैं यही सोचता रहा कि इन थानेदार साहब से पूछूं कि जुर्म न करने की कीमत क्या आम जनता ऐसे ही चुकाएगी।
Monday, October 19, 2009
Tuesday, October 6, 2009
निठारीकांड कुछ व्यक्तियों की बीमार मानसिकता का नतीजा
नोएडा के निठारी कांड की यादें एक बार फिर से ताजा हो गई हैं। मोनिंदर पंढेर को मिली राहत ने पीडि़त परिवारों के जख्मों को हरा कर दिया है। आज दो साल,आठ महीने और 6 दिन बीत चुके हैं इस शर्मनाक हत्याओं के 19 मामलों के भंडाफोड़ हुए। लेकिन फैसला महज एक ही मामले का आया है। यह है अपना सिस्टम। क्या कहें इस पर। जिन मामलों की गवाह हजारों आंखें हैं। उसमें भी अपराधी यदि कथित सबूतों के अभाव में बरी होता हैं। तो इसके लिए जिम्मेदार किसे माना जाए। 17 मामलों में सीबीआई से क्लीन चिट पाने वाले पंढेर के खिलाफ भी सबूत काफी हैं। लेकिन उसे राहत मिलना सिस्टम पर सवालिया निशान लगा रहा है।
29 दिसंबर 2006 के दिन निठारी मामला जनता और प्रशासन के सामने उजागर हुआ था। जिसने सुना उसके पैरों तले जमीन खिसक गई। निठारी में जिसने भी अपने बच्चे खोए हैं उनके दर्द को समझ पाना मुश्किल है। ये बच्चे मोनिंदर पंढेर की कोठी डी-5 में हवस के शिकार होने के बाद कत्ल कर दिए गए थे। पंढेर को उसके नौकर सुरेंन्द्र कोली के साथ गिरफ्तार किया गया। इसी पंढेर को दो साल सात महीने 13 दिन बाद 13 सितंबर को एक मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट से राहत मिल गई। पीडि़तों का आक्रोश फिर से उफन पड़ा है। मोनिंदर को मिली राहत ने पीडि़तों अंदर तक झकझोर कर रख दिया है। उन्हें लगता है यह भ्रष्ट सिस्टम धीरे-धीरे इस केस को कमजोर कर देगा। यहां हर कोई बिका हुआ है। इस जनता को लगता है कि इन सभी अपराधों का ठीकरा सुरेंद्र कोली के सिर पर मढ़ दिया जाएगा और पंढेर बरी कर दिया जाएगा। कोली को सजा-ए-मौत जैसी कोई सजा सुना दी जाएगी और असली गुनेहगार छूट जाएगा। इसका दर्द और बेचारगी अब इन के चेहरे पर नजर आने लगी है। इसकी छटपटाहट और आक्रोश नजर आना शुरु हो चुका है। ये पीडि़त शांत ज्वाला मुखी के समान बने हुए हैं
जो कभी भी लावा उगल सकता है। यदि ऐसा हुआ तो उस वक्त की स्थिति बहुत ही भयावह होगी। उसके बाद मीडिया में और बुद्धिजीवी वर्ग के पास बहस करने के लिए एक नया मुद्दा होगा। अगर कुछ होगा तो सिर्फ बहस और बहस...............नतीजा शून्य । हम सिर्फ यही कर सकते हैं। लेकिन फिर भी हम आशावादी बनने की कोशिश करेंगे और इतंजार करेंगे शायद कुछ सही
और सार्थक नतीजा निकल आए।
आइए डालते हैं एक नजर पूरे घटनाक्रम पर
29 दिसंबर 2006 को सीओ दिनेश यादव ने मोनिंदर पंढेर व सुरेंन्द्र कोली को गिरफ्तार किया और पंढेर की कोठी से हडि्डयां, खोपडि़यां
और हथियार बरामद किए।
10-01-07 को मामला नोएडा पुलिस से सीबीआई को ट्रांसफर किया गया।
25-01-07 को दोनों आरोपियों को गाजियाबाद कचहरी में पेशी के दौरान लोगों ने पीटा।
1-3-07 को दिल्ली अदालत में सुरेन्द्र कोली के इकबालिया बयान दर्ज कराए गए।
16-07-07 कोर्ट ने पंढेर को रिंपा हल्दर मर्डर केस में भी अनिल हल्दर के बयान के आधार पर आरोपी माना।
16-08-07 को नंदलाल के बयान के आधार पर सीओ दिनेश यादव को सीबीआई कोर्ट ने भ्रष्टाचार अधिनियम में आरोपी माना।
29 दिसंबर 2006 के दिन निठारी मामला जनता और प्रशासन के सामने उजागर हुआ था। जिसने सुना उसके पैरों तले जमीन खिसक गई। निठारी में जिसने भी अपने बच्चे खोए हैं उनके दर्द को समझ पाना मुश्किल है। ये बच्चे मोनिंदर पंढेर की कोठी डी-5 में हवस के शिकार होने के बाद कत्ल कर दिए गए थे। पंढेर को उसके नौकर सुरेंन्द्र कोली के साथ गिरफ्तार किया गया। इसी पंढेर को दो साल सात महीने 13 दिन बाद 13 सितंबर को एक मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट से राहत मिल गई। पीडि़तों का आक्रोश फिर से उफन पड़ा है। मोनिंदर को मिली राहत ने पीडि़तों अंदर तक झकझोर कर रख दिया है। उन्हें लगता है यह भ्रष्ट सिस्टम धीरे-धीरे इस केस को कमजोर कर देगा। यहां हर कोई बिका हुआ है। इस जनता को लगता है कि इन सभी अपराधों का ठीकरा सुरेंद्र कोली के सिर पर मढ़ दिया जाएगा और पंढेर बरी कर दिया जाएगा। कोली को सजा-ए-मौत जैसी कोई सजा सुना दी जाएगी और असली गुनेहगार छूट जाएगा। इसका दर्द और बेचारगी अब इन के चेहरे पर नजर आने लगी है। इसकी छटपटाहट और आक्रोश नजर आना शुरु हो चुका है। ये पीडि़त शांत ज्वाला मुखी के समान बने हुए हैं
जो कभी भी लावा उगल सकता है। यदि ऐसा हुआ तो उस वक्त की स्थिति बहुत ही भयावह होगी। उसके बाद मीडिया में और बुद्धिजीवी वर्ग के पास बहस करने के लिए एक नया मुद्दा होगा। अगर कुछ होगा तो सिर्फ बहस और बहस...............नतीजा शून्य । हम सिर्फ यही कर सकते हैं। लेकिन फिर भी हम आशावादी बनने की कोशिश करेंगे और इतंजार करेंगे शायद कुछ सही
और सार्थक नतीजा निकल आए।
आइए डालते हैं एक नजर पूरे घटनाक्रम पर
29 दिसंबर 2006 को सीओ दिनेश यादव ने मोनिंदर पंढेर व सुरेंन्द्र कोली को गिरफ्तार किया और पंढेर की कोठी से हडि्डयां, खोपडि़यां
और हथियार बरामद किए।
10-01-07 को मामला नोएडा पुलिस से सीबीआई को ट्रांसफर किया गया।
25-01-07 को दोनों आरोपियों को गाजियाबाद कचहरी में पेशी के दौरान लोगों ने पीटा।
1-3-07 को दिल्ली अदालत में सुरेन्द्र कोली के इकबालिया बयान दर्ज कराए गए।
16-07-07 कोर्ट ने पंढेर को रिंपा हल्दर मर्डर केस में भी अनिल हल्दर के बयान के आधार पर आरोपी माना।
16-08-07 को नंदलाल के बयान के आधार पर सीओ दिनेश यादव को सीबीआई कोर्ट ने भ्रष्टाचार अधिनियम में आरोपी माना।
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