Sunday, April 4, 2010

बसपा और कांग्रेस में दलित वोटों के लिए घमासान

उत्तर प्रदेश में 2012 के प्रस्तावित विधानसभा चुनाव को लेकर दलित वोटों के लिए कांग्रेस और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) में रस्साकसी चरम पर है। इसके लिए दोनों में अक्सर टकराव की नौबत भी बन जाती है। बसपा अपने इस मूल वोट बैंक को हर हाल में संजोए रखना चाहती है जबकि कांग्रेस महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) तथा अन्य कार्यक्रमों के जरिए इस वोट बैंक को दोबारा अपने पाले में लाकर बसपा का एकाधिकार हर हाल में समाप्त करने पर तुली है।


डा. भीमराव अम्बेडकर की जयन्ती पर उनके नाम से 27 सितम्बर 1995 को घोषित अम्बेडकर नगर जिले से कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी एक बडी रैली आयोजित करने जा रहे हैं। रैली के बाद वहीं से वह पहले चरण में 31 मई तक चलने वाली दस रथयात्राओं को राज्य के विभिन्न क्षेत्रों के लिए हरी झण्डी दिखाकर रवाना करेंगें। राज्य के विभिन्न जिलों में जाने वाली यात्राओं के दौरान होने वाली सभाओं को कई केन्द्रीय मंत्री कुछ राज्यों के मुख्यमंत्री तथा पार्टी के वरिष्ठ नेता सम्बोधित करेंगें। डा0 अम्बेडकर जयन्ती को शुरू हो रही यह यात्राएं स्वत चुनाव का सन्देश दे रही हैं। यह यात्राएं ज्यादातर दलित बाहुल्य क्षेत्रों से होकर गुजरेंगी। इसके रास्ते तय हो गए हैं। हर मंडलों में यात्रा प्रभारी की नियुक्ति तक हो गई है।

प्रदेश कांग्रेस के मीडिया विभाग के प्रमुख अखिलेश प्रताप सिंह इसे (एडवान्स इलेक्शन कम्पेन) मानते हैं। उनका कहना है कि इन यात्राओं को राज्य विधान सभा के 2012 में प्रस्तावित चुनाव की तैयारियों के रिहर्सल के तौर पर देखा जाना चाहिए। सिंह ने कहा कि यात्राओं के दौरान (मनरेगा) समेत अन्य केन्द्रीय योजनाओं को प्रचारित किया जाएगा। अन्य दलों की नीतियों पर भी प्रकाश डाला जाएगा। राज्य सरकार की विफलताओं को खासतौर पर उजागर किया जाएगा।


उन्होंने बताया कि यात्रा का मुख्य स्लोअन "अतीत की नींव पर भविष्य का निर्माण" है। उनका कहना था कि यात्रा का दूसरा चरण बरसात के बाद होगा। दूसरे चरण की यात्रा में नवम्बर में सोनिया गांधी इलाहाबाद में शामिल होंगी। अम्बेडकर जयन्ती पर ही बसपा ने भी राज्यव्यापी धरना प्रदर्शन की घोषणा कर रखी है। अम्बेडकर नगर में कांग्रेस और बसपा के कार्यक्रम स्थल को लेकर टकराव की भी सूचनाएं आई थीं। बसपा अपने कार्यक्रमों में खासतौर पर कांग्रेस को निशाने पर रखेगी। डा अम्बेडकर को कांग्रेसी शासन में भारत रत्न नहीं दिए जाने का भावनात्मक मुद्दा भी इसमें उठेगा।



बसपा ने पिछले 15 और 25 मार्च को अपने कार्यक्रमों में भी कांग्रेस पर हल्ला बोला था। मुख्यमंत्री और बसपा प्रमुख मायावती ने दलितों के बदतर हालात के लिए कांग्रेस को ही जिम्मेवार ठहराया था। मायावती ने राहुल गांधी के दलितों के घर जाने को भी नाटक ही करार दिया था। वह अपने मूल वोट बैंक को संजोए रखने के लिए कांग्रेस को कोसने में किसी भी सीमा तक जाने के लिए तैयार है। विधानसभा की तैयारियों के मद्देनजर इन दोनों दलों के साथ ही अन्य पार्टियां भी अपने अपने ढंग से तैयारियों को मूर्त रूप देने में लग गई हैं।



राज्य की प्रमुख विपक्षी दल समाजवादी पार्टी (सपा) पांच अप्रैल से मंडलीय सम्मेलनों की शुरुआत आगरा से कर रही है। यह सम्मेलन दो महीने तक चलेंगें। पिछले 23 मार्च को सपा की साइकिल यात्रा समाप्त हुई थी। जबकि 19 फरवरी को सपा अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव ने स्वयं गिरफ्तारी देकर कार्यकर्ताओं को अपने पुराने अन्दाज में आकर संघर्ष करने का सन्देश दिया था। यादव की कोशिश है कि मुस्लिम वोट हर हाल में उनकी पार्टी में बना रहे। इसके लिए उन्होंने आन्ध्र प्रदेश की तरह पूरे देश में मुसलमानों के आरक्षण की मांग उठा दी। उन्हें डर है कि लोकसभा के चुनाव की तरह मुस्लिम मतों की अच्छी खासी संख्या कहीं कांग्रेस में न न चली जाए। इसके लिए उन्होंने विवादित बाबरी ढांचे को गिराए जाने के लिए कांग्रेस को फिर से जिम्मेदार ठहराना शुरू कर दिया है।

मार्क्‍सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) ने आठ अप्रैल को जेल भरो आन्दोलन की घोषणा की है। माकपा महासचिव ने दो दिन पहले लखनऊ में यह ऐलान किया। मंहगाई के खिलाफ माकपा का यह आन्दोलन तो देशव्यापी है लेकिन इसी बहाने राजनीतिक दृष्टि से सबसे मजबूत समझे जाने वाले राज्य उत्तर प्रदेश में वह अपने पांव फिर से जमाना चाहती है। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने भ्रष्टाचार और मंहगाई के खिलाफ हस्ताक्षर अभियान चला रखा है। 26 मार्च से शुरू यह अभियान दस अप्रैल तक चलेगा। इसी बहाने उसके नेता गांव गांव जाकर अपने कार्यकर्ताओं में जागृति पैदा कर रहे हैं।



25 फरवरी को लखनऊ में भाजपा के कार्यकर्ताओं पर पुलिस ने बल प्रयोग किया था। भाजपा का मानना है कि इस तरह के आन्दोलन से ही विधानसभा के चुनाव में उसे लाभ होगा। राज्य के पश्चिमी इलाकों में खासा प्रभाव रखने वाले राष्ट्रीय लोकदल (रालोद) ने अम्बेडकर जयन्ती की पूर्व संन्ध्या पर 13 अप्रैल को मंहगाई और राज्य सरकार के कथित भ्रष्टाचार के खिलाफ मशाल जुलूस निकालने की घोषणा की है। रालोद महासचिव मुन्ना सिंह चौहान का कहना है कि मशाल जुलूस के माध्यम से दल अपनी बात आम जनता को बताएगा। इसके साथ ही भूमि अधिग्रहण अधिनियम 1894 को निरस्त करवाने के लिए सभी दलों से सम्पर्क साधा जा रहा है। इससे कृषि प्रधान इस देश के किसानों का उन्हें जरूर समर्थन मिलेगा।

Friday, March 26, 2010

पुलिस मांगे पब्लिक का भरोसा

किसी भी आपराधिक घटना के बाद पुलिस उस मामले में नसीहत देती नजर आती है। आपको ऐसा करना चाहिए था। आपको वैसा करना चाहिए था। आप लोग बहुत ही लापरवाह हैं। आप लोग ही अपराधियों को बढ़ावा देते हैं। जिसके चलते जुर्म होता है। अगर आप जैसे संभ्रात नागरिक संभल जाए ओर सतर्क रहें तो अपराध पर काबू पाया जा सकता है। ऐसे ही कुछ चिर परिचित वाक्य आपको सुनने को मिलेगे ।




नाम बिना लिए पुलिस अधिकारी के अपराध और अपराधियों पर उनके नजरिए को बता रहा हूं । कैसे उन्होंने अपनी बात रखी और एक सांध्य दैनिक अखबार ने उसे छापा । अधिकारी पुलिस विभाग में एसएसपी के पद पर तैनात हैं। उनका कहना था कि अपराध के कारण होते हैं। जहां पर आर्थिक प्रगति तेजी से होती है वहां पर अपराध भी तेजी से बढ़ते हैं। पुलिस के पास कोई जादू की छड़ी नहीं हैं कि अपराध होने से पहले ही उसे पता चल जाएं। पुलिस की कोशिश रहती है कि कानून व्यवस्था की स्थिति बेहतर रहे और बदमाश सक्रिय न होने पाए। यदि ऐसे में कहीं पर अपराध हो भी जाता है तो पुलिस कोशिश करती है अपराधियों को पकड़ने की और उनको सजा दिलाने की। कई बार अपराध लोगों के सामने होता है और लोग बोलने के लिए तैयार नहीं होते हैं। यदि वे लोग पुलिस पर भरोसा करें और उसें ठीक से जानकारी दें तो पुलिस काफी सफल हो सकती है। दिल्ली एनसीआर में काफी तादाद में लोग आते हैं, कंपनियों में नौकरी जाने या न मिलने से वे अपराध की ओर मुड़ जाते हैं। पुलिस के साथ साथ लोगों को भी अपराध के सामाजिक कारणों के बारे में सोचना होगा। आर्थिक असमानता अपराध को बढ़ावा दे रही है।



अब मुद्दा यह है कि पुलिस अपनी दलील में कहती है कि लोग उस पर भरोसा नहीं करते ओर सही जानकारी नहीं देते । यहां पर सवाल यह उठता है कि ऐसा क्यों हैं? पुलिस ने अपना भरोसा कैसे खोया ओर कैसे? लोग क्यों भरोसा नहीं करते पुलिस पर। लोग क्यों सही जानकारी देने से कतराते हैं।

आज पुलिस कहती रहती है लोग हम पर भरोस नहीं करते, हमें सही जानकारी नही देते हैं। जिसकी वजह से अपराध और अपराधियों पर अंकुश लगाने में दिक्कत होती है।

यह भरोसा जैसा शब्द एक बहुत ही बड़ा सवाल है पुलिस के पास, जिसका जवाब पुलिस ढूंढ रही है। लोग कैसे भरोसा करें पुलिस पर ठीक उस तरह जैसे वे डॉक्टर पर करते हैं। जब डॉक्टर कहता है पेंट उतारो और उलटे लेट जाओ। तो कितने भरोसे के साथ व्यक्ति लेट जाता है। ऐसा विश्वास पुलिस कब हासिल कर पाएगी।

पुलिस को अपने सवालों के जबाव खुद ढूंढने होंगे और कुछ सार्थक प्रयास करने होंगे। सिर्फ गाल बजाने से कुछ नहीं होगा। तो पब्लिक का भरोसा जीतने के लिए ..........................
भरोसा किसी बाजार में नहीं बिकता है जिसे खरीदा जा सके....................

यदि कानून व्यवस्था बेहतर रहे तो अपराध और अपराधी नहीं पनप पाएगें। पुलिस अपराधियों को पकड़ने की कोशिश करने की बजाए ठोस कार्रवाई और कार्यवाई करे।

समाज है तो अपराध तो होगे ही लेकिन उसी समाज को व्यवस्थित रुप से चलाने के लिए पुलिस और कानून की व्यवस्था की गई। उसमें पुलिस कहां तक सफल हो पाई है। यह पुलिस खुद सोचे। पुलिस को अपने ऊपर लगे सभी लेबल उतारने पड़ेंगे और नई ईमेज बनाने होगी।


अगर ऐसा हो पाया तो वो दिन जल्द ही आ जाऐंगे जब व्यक्ति बेझिझक पुलिस और थानों की तरफ भरोसे के साथ जा सकेगा।

Thursday, March 4, 2010

मासूम बच्चियों के साथ बलात्कार, उत्तर प्रदेश अव्वल

आज हम बात कर रहे हैं मासूम बच्चियों के साथ होने वाले बलात्कार के बारे में। जिन्हें बलात्कार का मतलब तक नहीं पता होता है। बलात्कार इन बच्चियों के लिए जीवनभर का एक भयानक दर्द और सिर्फ ऐसा दर्द लेकर आता है जिसे शब्दों में लिख पाना बहुत ही मुश्किल काम है। इस घटना को तो पीडि़त बालिका भी बयां नहीं कर सकती। यह वह घटना जो जीवन की दिशा ही बदल देती है।

इस ब्लाग में ऐसी ही बालिकाओं के बारे में लिखा गया है, जो ऐसे वहशियों की शिकार बनी हैं। किस राज्य में ऐसे कितने भेडि़ये हैं जिनका ब्यौरा निकाल पाना तो मुश्किल है लेकिन पीडि़त बालिकाओं के सरकारी आकड़ों से अंदाजा लगाया जा सकता है। किस राज्य में कितने वहशी दरिदें हैं। इन आकड़ोंबाजी में उत्तर प्रदेश सबसे अव्वल है और यह वही प्रदेश है जहां की सीएम एक महिला मायावती, दो महिला सांसद नेहरु परिवार से संबध रखने वाली सोनिया गांधी और मेनका गांधी हैं। एक दलितों की मसीहा है तो दूसरी तरफ देश की स्वतंत्रता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने का गौरव हासिल करने वाले नेहरु परिवार की पुत्रवधुएं हैं। उसी प्रदेश की यह हालत है।

तो आइए नजर डालते हैं इन आकड़ों के खेल पर -------------
बच्चियों से बलात्कार के मामले में वर्ष 2008 में उत्तर प्रदेश शीर्ष पर रहा जहां ऐसे 900 मामले सामने आये। उत्तर प्रदेश के बाद मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में बच्चों से बलात्कार के सबसे ज्यादा मामले दर्ज किये गये।

गृह मंत्रालय के हालिया आंकड़ों के मुताबिक, पिछले तीन वर्ष में बच्चों से बलात्कार के मामलों की संख्या में लगातार वृद्धि दर्ज की गयी है। वर्ष 2006 में कुल 4,721, 2007 में 6,045 और 2008 में 6,363 मामले सामने आये।

पुलिस ने 2006 में इस तरह के अपराध में संलिप्त 5,489 लोगों को गिरफ्तार किया। वहीं, 2007 में 5,756 और 2008 में 6,363 लोगों को गिरफ्तार किया गया।

आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2008 में उत्तर प्रदेश में इस तरह के 900, मध्य प्रदेश में 892, महाराष्ट्र में 690, राजस्थान में 420 तथा आंध्र प्रदेश में 412 मामले सामने आये।



आंकड़े कहते हैं कि छत्तीसगढ़ में ऐसे कुल 411, दिल्ली में 301, केरल में 215, तमिलनाड़ु में 187, पश्चिम बंगाल में 129, पंजाब में 106 और त्रिपुरा में 104 मामले सामने आये। वहीं, गुजरात में 99, कर्नाटक में 97, बिहार में 91, हरियाणा में 70, हिमाचल प्रदेश में 68, उड़ीसा में 65 और गोवा में 18 मामले दर्ज हुए।



यह आकड़े इस बात के गवाह हैं कि आदमी वासना की हवस में किस कदर अंधा है। वह अपनी काम वासना को तृप्त करने के लिए किसी भी हद तक जाने के लिए तैयार है। यह कामांध व्यक्ति उम्र नहीं देखता है। अगर उसे कुछ दिखाई देता है तो सिर्फ काम वासना को तृप्त करना। इसके लिए वह मासूम बच्चियों को निशाना बना रहें हैं। बच्चियों के साथ बलात्कार के मामलों के बारे में


आए दिन कोई न कोई खबर सुनने में आती ही रहती है। शायद ही कोई भूला हो निठारी कांड और पंधेर को। मासूमों के साथ बलात्कार काम वासना के साथ साथ बदला लेने की नियत से भी किया जाता है। जो कि उस शख्स की बीमार मानसिकता को भी दर्शाता है। मासूम बच्चियों के साथ बलात्कार के मामले में उत्तर प्रदेश के आकड़े साफ-साफ बयां कर रहे हैं कि यहां का सभ्य व्यक्ति कितना भला मानस है जो बच्चियों को अपना शिकार बनाता है और गर्व के साथ सीना चौड़ा करके चलता है।

सभ्यता का ढोल पीटने वाला मनुष्य आज भी वास्तविक रुप में जानवर ही है। जो मनुष्य होने का दावा करता है। तो दोस्तो फैसला आप ही कर लें किस तरह की स्थिति है। और हां आपको एक बात और याद दिला दे यह वही प्रदेश है जिसके लिए कभी बिग बी अमिताभ बच्चन बड़े जोर शोर के साथ प्रचार करते नजर आते थे "भईया बड़ा दम है इस प्रदेश में"
खैर दोस्तों यह एक गंभीर विषय है.........................

Monday, February 8, 2010

हर यात्री है सहमा हुआ


दिल्ली और एनसीआर आम आदमी के लिए पूरी तरह असुरक्षित है। यहां पर रहने वाला व्यक्ति हमेशा डरा डरा और सहसा सा रहता है। किसी के साथ कहीं भी सरेराह लूट और मारपीट हो जाना एक आम बात है। चोरी, हत्या, बलात्कार, डकैती यहां का दस्तूर बन चुका है। आम आदमी की जिंदगी कहीं भी सेफ नहीं है। वह बस में चलता है तो जेबकतरों से लेकर छोटे मोटे लूटेरों का शिकार होता है। ऐसे में चाकू से हथियार से मारा जाना तो जैसे उसकी किस्मत में लिखा है। ट्रेन में सफर के दौरान लूटपाट, हत्या, मारपीट और बलात्कार जैसी घटनाए काफी लंबे समय से चली आ रहीं हैं। कभी कभी तो ट्रेन में रक्षक ही भक्षक बन जाता है। दिल्ली काठगोदाम एक्सप्रेस में एक पति को अपनी पत्नि की सुरक्षा की कीमत बदमाशों से पिटकर चुकानी पड़ी।




लेकिन अभी कुछ दिनों पहले घटी लोकल ट्रेन में साहिबाबाद-गाजियाबाद के बीच लूटपाट और हत्या की घटना ने एकदम झकझोर कर रख दिया। सुरक्षा के नाम पर सिर्फ थोथेबाजी ही रह गई है। उसके बाद सिर्फ रह गई बयानबाजी और जिम्मेदारी से बचते अधिकारी। हर व्यक्ति अपना अपना पल्ला झाड़ने में लगा हुआ नजर आता है। लोकल ट्रेन में चलने वाले यात्री पहले डेली पैसेंजरों के रुप में दूधियों, स्टूडेंट जैसे यात्रियों के जुल्म के शिकार हुआ करते थे। अब वह लूटेरों के भी आसान शिकार होने लगे हैं। महिलाओं और छात्राओं की तो बात ही छोड़ दीजिए वे ट्रेन में चलने वाले मनचलों की सबसे पसंदीदा शिकार हैं। सुरक्षा के तमाम दावों के बावजूद ट्रेन में यात्री सुरक्षित नहीं है।