Monday, November 23, 2020

कोरोना अभी जिंदा है

अजय शर्मा की कलम से 


आज एक बार फिर से मुझे कहना पड़ रहा है कि कोरोना अभी जिंदा है। दिल्ली से आने वाले मौत और संक्रमित लोगों के आंकडें़ बताने के लिए काफी हैं कि हालात भयानक होने वाले हैं। यूरोपियन देशों के हालात तो पहले से ही बदतर हैं। 

काॅलर टियून में अमिताभ बच्चन की चेतावानी देती आवाज लोगों को कितना जागरूक कर पा रही है। यह बहस का विषय हो सकती है लेकिन राज्य सरकारों ने लोगों को कोरोना के दलदल में फंसाने वाला काम ही किया है। जानकारों ने पहले से ही चेताया था, डाॅक्टर्स ने भी बताया था कि सर्दियों में कोरोना जमकर कहर बरपायेगा। जैसे ही पारा नीचे जाएगा। संक्रमण का खतरा और बढ़ जाएगा। सर्दी, खांसी, नजला, बुखार लोगों को होंगे। मौसम जब बदलाव करता है तो इस तरह की बीमारियों की संभावनाएं तेज होती हैं। ये बीमारियां कोरोना को न्यौता देती हैं, दावत देती हैं। और अब वही हो रहा है। कोरोना का संक्रमण फिर से मुंह आने लगा है। कोरोना का आंकड़ा बढ़ रहा है। लेकिन हमने कुछ नहीं किया। हमने यानि हम और सभी राज्य सरकारें। हम आंखें बद करके बैठे हुए थे। हम शुतुरमुर्ग की तरह अपनी गर्दन जमीन में गाड़ ली कि सब अच्छा है। कुछ नहीं होगा। सब वहम है। बाजार खुले हुए थे। त्यौहारों को मौसम था। जबरदस्त भीड़ देखने को मिली। देश की राजधानी दिल्ली से लेकर नोएडा, गाजियाबाद, आगरा, मुरादाबाद, बरेली, लखनउ, चंडीगढ़, देहरादून, जयपुर, कोलकाता, मुंबई, पटना, अहमदाबाद, बंगलुरू तक कोई शहर नहीं बचा। लोग सड़कों पर और बाजारों में। देह दूरी की धज्जियां उड़ाई जा रही थी। कोई भी मास्क लगाने के लिए तैयार नहीं। लोग खतरों के खिलाड़ी बने हुए। लापरवाह, गैर जिम्मेदार लोग। हमने यह सब होने दिया। 

मैं आपको याद दिला दूं कि हमने घरबंदी भी स्वीकार की यानि कि लाॅकडाउन। हमने थाली ताली भी बजाई। हमने कोरोना वाॅरियर को सम्मानित भी किया। और अब कोरोना के संक्रमण का आंकड़ा 91 लाख को छू रहा है तो लोग कह रहें हैं कि यह तो होना ही था। इसके लिए सरकारें जिम्मेदार हैं।

लेकिन इस वक्त सबसे ज्यादा चर्चा देश के दिल दिल्ली की हो रही है। दिल्ली में केस बढ़ रहे हैं। दिल्ली सरकार और गृह मंत्रालय के बीच बैठक भी हो चुकी है। अलग अलग राज्यों में टीमें भी भेजी जा चुकी हैं। और अब तो दिल्ली बार्डर पर कोरोना की टेस्टिंग भी शुरू हो चुकी है। शादी विवाह जैसे सामाजिक आयोजन में लोगों की संख्या 200 से घटकर 50 तक हो गई है। यहां तक कि राजस्थान में रात का कफर््यू तक लगाया जा चुका है। दिल्ली में मास्क ना लगाने पर जुर्माना 2000 रूपए तक हो चुका है। 

आपके लिए मेरी यह चेतावनी है कि कोरोना शहर के साथ साथ गांव में भी फैल रहा है। हिमाचल का एक पूरा गांव शादी के आयोजन के बाद कोरोना से संक्रमित हो गया सिर्फ एक व्यक्ति बचा। यह सभी के लिए खतरे का अलार्म है गांव से लेकर शहर तक कोरोना संक्रमण तेजी से फैल रहा है। 

आज दिल्ली में मरने वालों की संख्या हर घंटे 4 लोगों की है। जिन लोगों ने इस बीमारी की वजह से अपनों को खोया है उनके दर्द को समझा जा सकता है। शमशान घाट पर अंतिम संस्कार के लिए भी लंबी लंबी लाइनें देखी जा सकती हैं। घंटों तक पीपीई किट में खड़े लोगों के आंसुओं को कोरोना सुखाए दे रहा है। दोस्त, पड़ोसी और रिश्तेदार अंतिम संस्कार के वक्त मौजूद नहीं है। कब्रिस्तानों में जगह खाली नहीं है और हम हैं कि मानते नहीं हैं। कोरोना इतनी तेजी से चपेट में ले रहा है कि संभलने का मौका तक नहीं मिल रहा है। अस्पतालों के हालात ऐसे हो चुके हैं कि दूसरी बीमारियों के मरीजों को इलाज मिलने में मुश्किल हो रही है।  

मौजूदा हालातों ने एक बात तो साबित की है कि कोरोना जागरूकता पर खर्च किया जाने वाला पैसा बर्बादी ही है। इसलिए सरकार को मास्क ना लगाने पर जुर्माने का रास्ता अपनाना पड़ा। आपको जानकर हैरानी होगी कि दिल्ली पुलिस ने अब तक 24 करोड़ से ज्यादा लोगों से जुर्माना वसूल लिया है लेकिन हम है कि मानते ही नहीं है।

आपदाएं, महामारियां आदम और हव्वा की संतानों का नसीब रही हैं, पर ये महा-बदनसीबी के दिन हैं। कोविड-19 ने धरती को अभूतपूर्व संकट में    झोंक दिया है। कोविड ने डब्ल्यू एच ओ पर भी सवालिया निशान लगा दिए हैं। इसके अस्तित्व और कार्य प्रणाली पर नये सिरे से बहस चल रही है। आखिर क्यों यह संस्था समय रहते इससे निपटने के कारगर उपाय नहीं ढूंढ पाई। क्यों यह समय से सटीक चेतावनी और गाइडलाइंस जारी नहीं कर पाई। 

दुनिया के लिए ये हालात दुखद हैं, क्योंकि इस संगठन ने अतीत में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है। स्मॉलपॉक्स के उन्मूलन और पोलियो पर सार्थक लगाम लगाने के मामले में डब्ल्यूएचओ की भूमिका बहुत बड़ी है। हमें ऐसी संस्थाओं की जरूरत है।

आइए आपको थोड़ा से कारोना के अतीत में लेकर चलता हूं कि इसी साल मार्च अप्रैल में लाॅकडाउन के वक्त क्या हालात थे। लॉकडाउन शुरू होने के बाद से लेकर अब तक की सबसे भयावह जो तस्वीर है, वो है मजदूरों के पलायन की और शमशान घाट की। ये मजदूर चले जा रहे थे, बस चले जा रहे थे, ट्रेनों के नीचे कट रहे थे, सड़कों पर हादसों का शिकार हुए जा रहे थे, भूख से तड़प रहे थे कभी प्यास से बिलख रहे थे. असल में इनकी सुध लेने वाला कोई नहीं था। और अब शमशान घाटों पर लंबी लंबी लाइनें हैं अंतिम संस्कारों के लिए।   


इसलिए आपको सोचना होगा, समझना होगा कि इस महामारी से बचने के लिए सर्तकता और बचाव ही उपाय है। वरना परिणाम आपके साथ साथ आपका यह समाज भी भुगतेगा। यह लड़ाई इंसानी सभ्यता को बचाने की है क्योंकि कोरोना अभी जिंदा है। 

   


  

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