Wednesday, November 25, 2020

मत भूलो यह कोरोना महामारी है

 अजय शर्मा वरिष्ठ पत्रकार  


गाजियाबाद पुलिस ने कोरोनान्वेशन को लेकर एक संदेश जारी किया कि अगर आपने घर से बाहर निकलते वक्त फ़ंक्शन नहीं लगाया तो आपको और 10 घंटे की असथाई जेल की सजा हो सकती है। साथ ही शादी के मौसम में सामाजिक भागीदारी के लिए लोगों की संख्या 50 कर दी गई है। आज देवठान है और मेरी सुयासटी में सुबह से बैंड बाजे वाले किसी घर में विवाह आयोजन के लिए बैंड बजा रहे हैं।


कोरोना महामारी के समय में विवाह के मौसम में शासन प्रशासन की व्यवस्था की अग्निपरीक्षा है। क्योंकि जरा सी भी लापरवाही कोरोना को दावत देना जैसी है। कोरोना की कालिख गहरी होती रही है। ये सिर्फ महामारी भर नहीं रह गई है। इसने समाज, सरकार, सरोकार और इंसानी संवेदनाओं पर अपना घातक पंजा जमा दिया है। यह समय मानवता के एक होने का था पर हो सकता है।


हमने पिछले कुछ महीनों में देखा है कि तमाम फर्जी ऑड-वीडियो और सोशल मीडिया के अदृश्य कीमियागीरों की हरकतों का कमाल रहा है कि देश की बड़ी आबादी के जेहन में कोरोना को लेकर भ्रांतियां भर गई हैं। ऐसे लोगों कों यह भी नहीं बिसराना चाहिए कि आज नहीं, तो कल महामारी अपने हिस्से की बलि लेकर चली जाएगी पर यह बेवकूफी और लापरवाही का विष समाज को तोड़-मरोड़कर रख देगा। मुझे इन दिनों अक्सर अल्वेयर कामू का प्लेग याद आता है। उपन्यास में ओरॉन नाम के शहर में प्लेग की वजह से नाकाबंदी हो गई थी और उसके बाद चर्च का पादरी जो कह रहा था, उसके साथ जो स्थिति बनी उसने वहां की तस्वीर इतनी भवावह बनाई उसे बयां करना मुश्किल है।

कोरोना की वजह से हमने पिछले कुछ महीनों में स्थितियों के प्रति पनप रहे अविश्वास को भी देखा है। भारत के अलग-अलग राज्यों की सरकारों के रूख ने जो तस्वीर दिखाई वो लोगों में गुस्सा और नाराजगी भरी। अमेरिका और यूरोप के तमाम देशों में सरकारों पर भी सवालिया निशान खड़े हुए। इटली, स्पेन और ब्रिटेन में रोगियों और मौतों की संख्या हर रोज अपना ही रिकॉर्ड तोड़ रही थी। ऐसे में कोरोनातीत ब्रिटिश प्रधानमंत्री की हर ओर थू-थू तो हो रही थी के साथ ही सरकार की कार्यशैली पर भी सवाल उठ रहे थे। अमेरिका से लेकर रूस तक सभी के हालात खराब थे। और हम अपने देश भारत में कोरोना को लेकर लापरवाही बरत रहे थे और आज भी वही स्थिति है। यकीनन पूरी दुनिया में सरकारों की विश्वसनीयता खतरे में पड़ गई है। अगर यह दौर लम्बा खिंचा तो यह धरती अराजकता की ओर बढ़ती दिखाई पड़ती है। भारत में लॉकडाउन को दोष से लागू करवाया गया और अब फिर से लाकडाउन की चर्चा हो रही है। 


संकट अगर पूरीची धरती का है, तो इसके वाशिंदों को एक तो होना पड़ेगा। कोविद -19 ने अपने पांव सरहनों को बिना पहचाने पसारे हैं। इससे लड़ाई भी ऐसे ही लड़नी होगी पर यह नामुमकिन है। अमेरिका का उदाहरण लैन। अब तक यह महादेश ऐसी आपदाओं के वक्त में एक क्लस्टर महाजन की तरह इमदाद मुहैया करा देता था। मैंने उसके लिए इस विशेषण का इसलिए उपयोग किया, क्योंकि किसी खुर्रान्त सूदखोर की भांति अमेरिका ने हमेशा अपनी इमदाद की बड़ी कीमत वसूल की है। इस समय पृथ्वी का स्वर्ग स्वयं नर्क में तब्दील हो गया है। 


अमेरिका और यूरोप के बाद शंकाएं, आशंकाएं और अधीरताएं पूरीची दुनिया में फैली हैं। सवाल उठता है कि जब धनी-मानी देश इसके सामने-विवश नजर आ रहे हैं, तो गरीब मुल्कों का क्या होगा? अमेरिका के डॉ और नर्स साधनहीनता की दुहाई दे रहे थे। रही बात भारत की तो हमारे तमाम अस्पताल तो प्राथमिक सुविधाओं तक से लैस नहीं हैं। बातें हम भले ही बहुत बड़े करते हों, पर सच यह है कि पहाड़ी, समुद्री और रिवानी क्षेत्रों के बहुत से गांवों में आज भी अगर कोई युवती गर्भवती होती है, तो उसे सलाह दी जाती है कि अपने मायके हो आओ, कहीं पीड़ित के दौरान। कुछ न हो जाए? आपको यह बताता है कि मेरे दिमाग में एक तस्वीर कौंध रही है। अप्रैल के महीने में मैंने मीडिया में कश्मीर के दुर्गम इलाके की फोटो देखी थी। कई लोग एक जुगाड़ की स्ट्रेचर पर गर्भवती महिला को टांगे ले जा रहे थे। चिकित्सा और स्वास्थ्य के मामले में हम आदिम युग में जी रहे हैं।


क्या आप भूल गए हैं कि कुछ महीने पहले तमाम राज्यों से ऐसी रिपोर्ट आईं जिसमें बताया गया था कि कोरोना मरीज का इलाज करने वाले चिकित्सा कर्मियों के पास जरूरी ड्रेस ही उपलब्ध नहीं हैं। यह तो दूर-की की बात थी, देश की राजधानी दिल्ली के बेहतरीन गंगाराम अस्पताल के दर्जनों चिकित्सा कर्मियों को क्वारंटीन कर दिया गया था। यदि कोई परिस्थिति बिगड़े, तो चिकित्सा कर्मियों के लिए खतरा और बढ़ेगा। 


यह हमारी स्थायी हतभागिता है की ऐन जंग के समय हमें मालूम पड़ता है कि हमारे युवा शेयर डिस्काउंट-ओ-सामानों को नहीं चला रहे हैं। अमेरिका और यूरोप में निजी अस्पताल इस महामारी से लड़ने में अपनी सरकारों की मदद कर रहे हैं। इसलिए मौजूदा समय में भारत में बड़े अस्पताल श्रृंखलाओं को इस मामले में खुल कर सामने आना चाहिए। गिने-चुने निजी अस्पताल हैं, जो इसका इलाज कर रहे हैं। सरकारी और निजी स्वास्थ्य सेवाओं के बीच तालमेल अगर नहीं बढ़ा, तो आने वाले दिनों में कठिनाई हो सकती है।


देश को चाहिए कि वह ऐसे मुद्दों पर विचार कर इनका हल जल्दी से खोजे कि आखिर हम कर क्या रहे हैं? इसकी उलट सारी बहस लव जिहाद कानून, एमएलसी चुनाव, जम्मू कश्मीर के जिला विकास परिषद चुनाव और बंगाल चुनाव पर केंद्रित हो गई है। हम पर और मुद्दों पर भी ध्यान देना होगा। अब तक जितने मरीज सामने आए हैं, वो शेरपाही का ही नतीजा है। इस ढिलाई का एक ही प्रायोजन है कि चिकित्सा सुविधाओं को जल्दी इस लायक बना लिया जाए कि वे संकट की स्थिति में आम आदमी की जीवन रक्षा कर सकें।


आज दिल्ली के साथ साथ पूरे देश में एक सिरहन लोगों के दिलों में बैठ गया है कि अगर उनके घर में कोई बीमार है, तो उसका क्या होगा? कहीं परिवार का एक और सदस्य तो उसकी चपेट में नहीं आ जाएगा? क्या पता कब इट्स हमें भी चपेट में ले ले?

ऐसे में प्रभावी व्यवस्था बनाना चुनौती का काम है। ऐसा नहीं हैं कि सरकारें सो रही हैं। केंद्र सरकार ने उस समय में लॉकडाउन कर दिया था, जब अधिकांश देश इसके बारे में सोच ही रहे थे। जिन्होंने देरी की, वे इसका दुष्परिणाम भुगत रहे हैं। जर्मनी ने कोरोना पीड़ितों के मामले में चीन को पीछे छोड़ दिया था। भारत में ऐसे भी मुख्यमंत्री हैं जिन्होंने कोरोना से आम जनमानस को बचाने के लिए दिन रात एक कर दिया है। 


हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि आपदा से लड़ने का सबसे बढ़िया तरीका आपसी सहयोग और निर्भरता है। हिन्दुस्तानियों को यह कायम रखना होगा यह कैसे होगा? हम तो गैरजरूरी मुद्दोंदो में सिर खपाए बैठे हैं।


No comments: