Wednesday, December 12, 2012

मेरी अलीगढ़ यात्रा



मुझे उत्तर प्रदेश का जिला अलीगढ़ जाने का मौका मिला। मैं थोड़ा सा उत्सुक था क्योंकि इस शहर के बारे में सिर्फ सुना था कि यह शहर तालों, गुण्डागर्दी और धार्मिक उन्माद के लिए जाना जाता है। मेरे कुछ पुराने दोस्त बताया करते थे कि घर में खाने के लिए हो या ना हो लेकिन कंधे पर बंदूक ज़रुर होगी।

इसलिए दोस्तों हम सुबह सुबह रेलवे स्टेशन पहुंच गए। लेकिन भाग्य से हमारी ट्रेन छूट गई और हमें दोपहर की ट्रेन से जाना पड़ा। गाजियाबाद में दोपहर 1.10 मिनट पर नई दिल्ली-लखनऊ गोमती सुपर फास्ट ट्रेन से अलीगढ़ की यात्रा करने के लिए पहुंच गए। लगभग 12.30 के समय मैं गाजियाबाद के रेलवे स्टेशन पर पहुंचा और जो वहां पर मैंने देखा और गाजियाबाद से अलीगढ़ की यात्रा मैं पूरी जिदंगी भुला नहीं पाउंगा। इस यात्रा में मैंने बहुत से अनुभव किए। जीवन के कई रंग देखे। जिस देश में करोड़ों और अरबों के घोटाले हो रहे हों उस देश के नागरिकों की हालत कितनी दयनीय है। वो किस तरह की यात्रा करने पर मजबूर हैं।

जब ट्रेन के आने की उदघोषणा हुई तो प्लेटफार्म पर जाने वाले यात्रियों की भीड़ जमा हो गई। भीड़ देखकर मैं अचंभित था। हे भगवान इतनी भीड़। ट्रेन जब प्लेटफार्म पर आई तो उसकी सभी बोगियां ठसाठस भरी हुई। आप इतनी भीड़ देखकर अंदाजा लगा सकते थे कि इसमें चढ़ना बहुत ही मुश्किल होगा लेकिन भीड़ फिर इसमें चढ़ ही गई। मैं भी इसमें चढ़ ही गया। अंदर की भीड़ के देखकर मैं हैरान था। लोग एक दूसरे पर चढ़े हुए से थे। मैं यही सोच रहा था कि रिजर्वेशन बोगी में भी इतनी भीड़। लोग उक दूसरे से सीट के लिए लड़ रहे थे। जिनके पास रिजर्वेशन टिकट था वो सीट के लिए लड़ रहे थे। कुछ बच्चे और महिलाएं सीट के पास नीचे ही बैठ गए। पूरे रास्ते चाय, पानी और सनैक्स वाले इस भीड़ को चीरकर आते जाते रहे। कुछ मनचले भीड़ का फयदा उठाते हुए कुछ महिलाओं और लड़कियों के बदन से पूरी तरह से सटे हुए थे। मनचलों का बस चलता तो वे सबकुछ ट्रेन में ही सबकुछ कर डालते। असहाय सी ये महिलाएं।

मैं यही सोचता रहा-- कैसी है ये जिदंगी और हमारी सरकार जो नागरिकों को सुविधाएं तक नहीं दे सकती।  

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